46 Views

“मिनी ये क्या तरीका है अपने से बड़ों से बात करने का, यही सिखाया है मैंने तुम्हें, चलो माफी मांगो चाचा से” मिनी की मम्मी ने मिनी को डांटते हुए कहा।
“मम्मी मैं क्यों माफी मांगू, इन्होंने क्या कहा था सुना नहीं आपने?”
“कुछ भी हो, मैंने कहा माफी मांगो| मेहमान हैं वो हमारे घर, ऐसे बात करते हैं मेहमान से?”
“मेहमान हैं तो चले क्यों नहीं जाते? महीने भर से यहीं बैठे हैं और जब से आए हैं उटपटांग की बातें करके सर खाते रहते हैं| घर का माहौल इतना खराब कर दिया है इन्होंने लगता ही नहीं कि मैं अपने घर में हूं” मिनी ने चिल्लाकर कहा।
“मिनी सुनाई नहीं दिया? कह दिया ना मुंह बंद करो और माफी मांगो”|
मां को गुस्से में देख बेमन से मिनी ने अपने चाचाजी से माफी मांगी और बड़बड़ाते हुए अपने कमरे में चली गई।
आए दिन घर में अब चीखने चिल्लाने की आवाजें आने लगी थीं। ऐसा नहीं है कि मिनी हमेशा चीखती चिल्लाती है। पर हां वह एक बिंदास खुले विचारों वाली लड़की है, जिसे अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीना पसंद है। दिल्ली जैसे शहर में एक संयुक्त परिवार में उसकी परवरिश हुई है| बचपन से वह अपने मम्मी-पापा, दो भाई, दो चाचा-चाची और उनके बच्चों के साथ रहती आई है। एक खुशहाल परिवार है।

उस परिवार में महीने भर पहले एक मेहमान का आगमन हुआ जिसका नाम है मुकेश| जनाब मिनी के पापा के चचेरे भाई हैं और काम की तलाश में दिल्ली आए हैं। मुंह बनाकर घर में घूमना और हर बात में अपनी टांग अड़ाना, मीन-मेख निकालना उनका पसंदीदा काम है, जैसे-:
“अरे आधे कपड़े कहां गए?”
मिनी की मम्मी छत पर सुखाए हुए कपड़े उतारने आई तो आधे कपड़े देखकर हैरानी से पूछा तो खीस निपोरते हुए महाशय मुकेश बोले,
“अरे भउजी हम उतारे हैं”|

ये भी पढ़ें:- बेटी ही रहने दीजिए ना पापा

“अरे तो भैया यह भी उतार लेते, अगर उतार ही रहे थे तो वरना उन्हें भी उतारने की क्या जरूरत थी?”
मिनी की मम्मी ने महाशय के हाथ से कपडे लेते हुए कहा तो फिर उन्होंने अपने दांत दिखा दिए और कहा, “उ क्या है ना भउजी हम औरतन के कपड़न को हाथ नहीं लगाइत”|
वहीं छत पर अपनी पढ़ाई कर रही थी मिनी से रहा नहीं गया उसने छूटते ही कहा, “मम्मी यह औरतों के कपड़े नहीं छू सकते, लेकिन उनके हाथ से बना खाना खा सकते हैं, उनके हाथ से धुले कपड़े पहन सकते हैं| यह तो शायद यह भी भूल गए हैं कि इन्होंने जन्म भी एक औरत से लिया है और तो और उसी औरत के आंचल की छांव के नीचे पले-बढे हैं”|
मिनी की बात सुनकर मम्मी मुस्कुरा उठी तो वही महाशय एकदम तिलमिला गए।
अपनी सोच के कारण बात-बात पर मिनी के निशाने पर आ जाते और मिनी भी ऐसा निशाना लगाती की चारों खाने चित्त हो जाते।
बच्चों पर अपनी धाक जमाने की कोशिश में जब वे नाकाम रहे तो उन्होंने मिनी की चाचियों को निशाना बनाना शुरू कर दिया अब आए दिन वह उसकी चाचियों पर बड़बड़ाने लगे।

और एक दिन
“अरे भैया इ दोनों जनी इतना धीरे काम करत हैं कि मना कहत है कि दू दू लात लगाई एकदम भले हो जाए”|
उनके ये शब्द सुनकर बुरा तो सबको लगा लेकिन कोई कुछ कह ना सका| वहीं मिनी के कानों में जब यह बात गई तो उससे रहा नहीं गया।
“वाह वाह क्या संस्कार हाँ चाचा जी आपके! जब से आए हैं मुझे और मेरे भाइयों को संस्कार का पाठ पढ़ा रहे हैं और यह संस्कार हैं आपके, आपके बड़े भाइयों की पत्नियां आपकी बड़ी भाभियाँ हैं इस तरह बात की जाती है उनसे?”
इतना कहकर वह रौद्र रूप धारण करती हुई अपने चाचाओं से भी भिड़ गई|
“हो क्या गया है आप लोगों को? आप लोगों के सामने बाहर से आकर कोई भी आपकी पत्नियों को इस तरह के अपशब्द कहेगा और आप लोग चुप रहेंगे, बर्दाश्त कैसे कर रहे हैं?”
शोर सुनकर फिर मिनी की मम्मी आई और उसे वहां से ले गई। वह जानती थी मिनी गलत नहीं है लेकिन बात जब ससुराल से आए किसी मेहमान की हो तो उनका बस नहीं चलता था।
आए दिन किसी न किसी बात को लेकर घर में कोहराम मचाने लगा। महाशय मुकेश की नजर में मिनी बददिमाग मुंहफट और बिगड़ी हुई लड़की है जो हर बात पर उनकी बेइज्जती करती है, फिर भी मिनी की छोटी बड़ी गलती पर उसे रोकना उन्होंने अपना अधिकार समझ लिया था, हद तो तब हो गई जब नहाकर निकली कैपरी पहनी हुई मिनी की टांगों पर उन्होंने टिप्पणी की।
“ई देखा आपन गोर गोर गोड दिखावत हईन, ई नाय की सलवार सूट पहन ले”

इतना सुनते ही मिनी का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया।
“आप होते कौन हैं? मुझे यह बताने वाले की क्या पहनू क्या नहीं और रही बात मेरे पैर दिखाने की तो देख ही क्यूँ  रहे हैं आप? किसने कहा है आपको मेरे पैर देखने के लिए? गोरे हो या काले देखा क्यों आपने? इतने साल हो गए, बचपन से मैं अपने दोनों चाचा के साथ रहती आई हूं आज तक उन्होंने तो कभी नहीं देखा, इसलिए आए हैं आप यहां?
ई तो हद होई गई तमीज नाय बा ई लड़की मा बिल्कुल”
“तमीज आप तो रहने ही दीजिए जब से घर में आए हैं जीना हराम कर के रखा हुआ है सबका, इतनी घटिया सोच है आपकी।
शोर सुनकर फिर मिनी की मम्मी आई, मिनी को डांटते हुए वहां से ले गई। लेकिन आज की घटना से पूरा घर परेशान था मिनी के पापा पिछले एक महीने से यह सब देख और सुन रहे थे और अंत में उन्होंने एक निष्कर्ष पर पहुंचते हुए मुकेश महाशय को बुलाकर कहा,
“देखो मुकेश, तुम्हें हमारे साथ काम करना है तो तुम काम कर सकते हो, लेकिन जिस तरह से तुम यहां रहते हो वैसे मैं तुम्हें अपने घर पर नहीं रख सकता| तुम अपने लिए रहने का इंतजाम कहीं और कर लो।”
दोस्तों, कई बार ऐसा होता है हमारे घर कोई ऐसा अनचाहा मेहमान आ जाता है जो हर बात पर टीका टिप्पणी करता है क्या आपके साथ भी कभी ऐसा हुआ है क्या सोचते हैं आप, इनके और मिनी के बारे में अपनी कीमती राय जरूर दीजिएगा।

नीरजा तिवारी

By नीरजा तिवारी

शब्दों के सागर से मोती चुन,उन्हें भावनाओं में पीरोती हूँ...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *