माहवारी कोई बीमारी नहीं,औलाद का एक सुख होता है हर स्त्री का जीवन ।

प्रीति -युवा पत्रकार, नई दिल्ली।। आज भी भारत के अंदर ऐसी कई जगह है जहां मासिकधर्म और माहवारी को एक बीमारी समझा जाता है। माहवारी के समय लड़कियों और महिलाओं को प्रतांडित किया जाता है। दैनिक जागरण में एक लेख पढ़ा, जिसका शिर्षक था “माहवारी कोई बीमारी नहीं ” जिसमें आन्ध्रप्रदेश  के गंतहल्लागोटी गांव में महिलाओं के माहवारी  और गर्भवति  होने के पश्चात गांव से दूर बांस व ताड़ के पत्तो में झोपड़ी झुग्गी बनाकर रहने और पानी बिजली सहित कई अन्य मौलिक अवश्यकताओं से दूर रखा जाता है, सिर्फ इसलिए कि उनकी वर्षों से चलती आ रही परंपरा को चोट न पहुँचे। परंपरा का सम्मान करना हमारा मूल कर्तव्य है। लेकिन इस तरह की  कुप्रथा मेक इन इंडिया, स्मार्ट सिटी, स्किल इंडिया,बनने में बाधा साबित होगी। भारत का एक सोचा हुआ सपना अधूरा रह जाता है जब ऐसी कु-प्रथायें उजागर होती है। एक तरफ हमारे भारत मे बेटियों के लिए बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ,सुकन्या समृद्धि योजना, गर्वती महिला के लिए आर्थिक योजना जैसी अनेकों योजने बनाई गई है, इन सबके बावजूद ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं।

हमें यह समझना होगा कि महिलाएं, बेटिया आज किसी भी मायने में लड़कों से कम नहीं। लड़िकयां लड़को के कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं। जिसका सामान्सा उदाहरण है हरियाणा के सोनीपत की ‘अनु कुमारी’। इसी वर्ष अनु कुमारी जिन्होंन भारत में सिविल परीक्षा में दूसरा स्थान प्राप्त किया है। वो लड़कियों के लिए एक आदर्श बनी हैं। ऐसे ही न जाने कितने उदाहरण मिल जाएंगें जिनमें लड़कियों ने बार बार यह साबित किया है कि वो किसी से कम नही है। इसके बावजूद भारत के कुछ राज्य के गाँव अभी भी ऐसे क्यों हैं? जहां पुरुष प्रधानता फलता फूलता दिखाई देता है।

हम दूर बैठे इस तरह की प्रथा को नहीं जान पाते। ये एक शर्मसार करने वाली बात है, ऐसी घटनाएं हमे आज भी सुने में आ रही हैं। जहां हमारा देश मेक इन इंडिया, मेड इन इंडिया बनने की बात कर रहा है। इसके लिए आज  हमारे बीच एक कुशल और जागरूक पत्रकार एवं लेखक का होना बहुत ज़रूरी हो गया है। इस तरह की कुप्रथाओं को सिर्फ हम ही खत्म कर सकते हैं। अवश्यक है केंद्र सरकार और राज्य सरकार को भी मिलाकर इसके लिए पुख्ता कदम उठाने चाहिए। सरकार अपनी योजनाओं को ऐसे न साबित करे कि वो इन योजनाओं को बनाकर भूल गई है।

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