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भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) ने रक्त प्लाज़्मा थेरेपी (plasma therapy) से कोविड-19 संक्रमित मरीज़ों के उपचार के ट्रायल की अनुमति दे दी है। आईसीएमआर (ICMR) ने इस क्लीनिकल ट्रायल में शामिल होने के लिए विभिन्न संस्थाओं को न्योता दिया है। इस अध्ययन का मकसद यह पता करना होगा कि प्लाज़्मा कॉन्वलेसन्ट थेरेपी (Convalescent Plasma Therapy) इस रोग के इलाज में कितनी असरदार है? यह भी बात गौर करने वाली है कि महामारी के केंद्र चीन में इस विधि से इलाज में सकात्मक नतीजे आए हैं। समझा जा रहा है कि प्लाज्मा तकनीक कोविड-19 संक्रमण के इलाज में उम्मीद की एक किरण हो सकती है।

क्या है कॉन्वलेसन्ट प्लाज़्मा थेरेपी? (Convalescent Plasma Therapy)
अगर क्लीनिकल ट्रायल सफल होता है तो कोरोना से ठीक हो चुके मरीज़ों के रक्त प्लाज़्मा (plasma) से इस रोग से पीड़ित अन्य मरीजों का उपचार किया जा सकेगा। एम्स के मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर नवल विक्रम ने एक मीडिया संस्थान को बताया कि कोरोना से ठीक हो चुके एक व्यक्ति के खून से कोरोना पीड़ित चार लोगों का इलाज किया जा सकता है। एम्स के मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डॉक्टर नवल विक्रम के मुताबिक यह उपचार प्रणाली इस धारणा पर काम करती है कि वे मरीज़ जो किसी संक्रमण से उबर जाते हैं उनके शरीर में संक्रमण को बेअसर करने वाले प्रतिरोधी एंटीबॉडीज़ विकसित हो जाते हैं। इसके बाद नए मरीज़ों के खून में पुराने ठीक हो चुके मरीज़ का खून डालकर इन एंटीबॉडीज़ के ज़रिए नए मरीज़ के शरीर में मौजूद वायरस को खत्म किया जाता है। दरअसल, जब कोई वायरस व्यक्ति पर हमला करता है तो उसके शरीर की रोग प्रतिरोधक प्रणाली संक्रमण से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज़ कहे जाने वाले प्रोटीन विकसित करती है। अगर कोई संक्रमित व्यक्ति पर्याप्त मात्रा में एंटीबॉडीज विकसित करता है तो वह वायरस से होने वाली बीमारियों से उबर सकता है। कॉन्वलेसन्ट प्लाज्मा थैरेपी के पीछे आइडिया यह है कि इस तरह की रोग प्रतिरोध क्षमता रक्त प्लाज्मा थैरेपी के जरिए एक स्वस्थ व्यक्ति से बीमारी व्यक्ति के शरीर में ट्रांसफर की जा सकती है। कॉन्वलेसन्ट प्लाज्मा का मतलब कोविड-19 संक्रमण से ठीक हो चुके व्यक्ति से लिए गए रक्त के लिक्वेड पार्ट से है। इस थैरेपी में ठीक हो चुके लोगों का एंटीबॉडीज से समृद्ध रक्त का इस्तेमाल बीमार लोगों को ठीक करने में किया जाएगा।

ठीक मरीज से 14 दिन बाद ही लिया जा सकता है प्लाज़्मा (plasma)
प्रोफेसर नवल विक्रम के मुताबिक किसी मरीज़ के शरीर से प्लाज़्मा (plasma)( एंटीबॉडीज) उसके ठीक होने के 14 दिन बाद ही लिया जा सकता है और उस रोगी का कोरोना टेस्ट एक बार नहीं, बल्कि दो बार किया जाएगा। इतना ही नहीं ठीक हो चुके मरीज़ का एलिज़ा टेस्ट भी किया जाएगा ताकि यह पता चल सके कि उसके शरीर में एंटीबॉडीज़ की मात्रा कितनी है। इसके अलावा प्लाज़्मा (plasma) देने वाले व्यक्ति की पूरी जांच की जाती है कि कहीं उसे कोई और बीमारी तो नहीं है।

एक डोनर के प्लाज़्मा (plasma) का चार मरीजों में इस्तेमाल
इस तकनीक में ठीक हो चुके रोगी के शरीर से ऐस्पेरेसिस विधि से खून निकाला जाएगा। इस विधि में खून से सिर्फ प्लाज़्मा (plasma) या प्लेटलेट्स जैसे अवयवों को निकालकर बाकी खून को फिर से उस डोनर के शरीर में वापस डाल दिया जाता है। प्रोफेसर नवल विक्रम के मुताबिक एक व्यक्ति के प्लाज़्मा (plasma) से चार नए मरीजों को ठीक करने में इसका इस्तेमाल हो सकता है। दरअसल एक व्यक्ति के खून से 800 मिलीलीटर प्लाज़्मा (plasma) लिया जा सकता है। वहीं कोरोना से बीमार मरीज के शरीर में एंटीबॉडीज डालने के लिए लगभग 200 मिलीलीटर तक प्लाज़्मा (plasma) चढ़ाया जा सकता है। इस तरह एक ठीक हो चुके व्यक्ति का प्लाज़्मा (plasma) 4 लोगों के उपचार में मददगार हो सकता है।  उन्होंने बताया कि यह सभी रोगियों को देने की जरूरत नहीं हैं। जिन रोगियों की तबीयत ज्यादा खराब है, उन्हीं को यह दिया जाए तो ज्यादा बेहतर है क्योंकि अभी देश में ठीक हो चुके रोगियों की संख्या बहुत कम है जबकि नए मरीज़ तेज़ी से बढ़ रहे हैं।

पांच मेडिकल कॉलेजों को ट्रायल की अनुमति:
देश के पांच आयुर्विज्ञान कॉलेज और अस्पतालों में इसका क्लीनिकल ट्रायल किया जाएगा। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने बताया कि तिरुवनंतपुरम स्थित चित्रा तिरुनाल आयुर्विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान को क्लीनिकल ट्रायल के तौर पर सीमित संख्या में इस तकनीक के इस्तेमाल की अनुमति मिली है। चित्रा तिरुनाल आयुर्विज्ञान संस्थान की निदेशिका डॉ. आशा किशोर ने कहा कि कोरोना वायरस से संक्रमण के ठीक हो चुके मरीज के रक्त प्लाज़्मा (plasma) की पर्याप्त मात्रा में उपलब्धता के लिए उन्होंने रक्त दान की उम्र सीमा में रियायत देने की मांग की है।

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