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“कुसुम कहां हो उठी कि नहीं सूरज सर पर चढ़ आया है और यह महारानी अभी तक सो रही है कुसुम… कुसुम” चिल्लाते हुए कुसुम की सासु मां सुधा जी दरवाजा पीटने लगी।

“मां वो उठ गई है उधर ही कहीं होगी रोज-रोज दरवाजा पीटना जरूरी है क्या, नींद खराब कर देती हो” कुसुम के पति आकाश ने नींद में झल्लाते हुए अपनी मां से कहा।

“हां हां सुबह-सुबह मेरा दिमाग खराब हो जाता है ना इसलिए, एक घंटा हो गया है उठे महारानी का कुछ पता ही नहीं है कहां है?

“मां छत पर जल चढ़ाने गई थी कुछ कपड़े पड़े थे वही समेटने लगी थी” लगभग भाग कर आते हुए कुसुम ने कहा।

“अच्छा-अच्छा अब बातें बनाना बंद भी कर, गर्म पानी कर दे मेरे लिए” सुधा जी ने झल्लाकर कहा।

कुसुम एक मध्यमवर्गीय परिवार की बहू है एक भरा-पूरा परिवार सास-ससुर, तीन ननदें, एक देवर, पति और तो और बड़ी ननद के दो बच्चे भी। क्या है ना कि उनके पति से उनकी बनती नहीं है तो ज्यादातर अपने मायके ही रहती हैं या यूं कहे की सुधा जी की नजर में उनकी बेटी पर जुल्म करते हैं वह, इसलिए उसे वहां जाने नहीं देती।

इन सब के पीछे है कुसुम अपने नाम की तरह सुंदर, सुशील सब को मोह लेने वाली कुसुम, जो भी एक बार उसकी तरफ देखे बस देखता ही रह जाए, सुंदर-सुडौल नैननक्श के साथ एक आकर्षक व्यक्तित्व की मालकिन है पर इस घर की चारदीवारी में बहू है यह उसका घर है जिसे उसे सम्भालना सहेजना है, ढेर सारे कर्तव्य हैं जिन्हें उसे पूरा करना है।

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सुबह पांच बजे बिस्तर छोड़ देना झाड़ू-पोछा कर, दिया बाती फिर नाश्ता वो भी सब की फरमाइश का, घर के बर्तन, सब के कपड़े धोना, प्रेस करना फिर उन्हें उनके अनुसार अलमारी में रखना, यहां तक कि उसकी तीनों नंदे अपनी इनरवियर्स भी बाथरूम में छोड़ देती थी जिन्हें उसे ही धोना पड़ता था, कई बार उसका मन के खिन्नता से भर जाता, लेकिन परिवार की नजर में जो उसे पूर्ण बनाए वो घर के सभी काम करती।और जब थक कर चूर हो जाती तो निढाल हो बिस्तर पर जा पडती।

आकाश सब देखता था सब समझता था लेकिन अपने घर वालों के सामने कुछ कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। वह बस उसके सर पर प्यार से हाथ फेरता अपने सीने से लगाता उसी से वह मुरझाई हुई कुसुम फिर खिल उठती। कभी कुछ कहती तो हमेशा यही जवाब होता, “वो अभी हमारी शादी को सिर्फ 6 महीने ही हुए हैं ना थोड़ा वक्त दो सब ठीक हो जाएगा” पति की तरफ से आए इस जवाब से फिर एक उम्मीद लगा लेती की एक दिन सब ठीक हो जाएगा।

“आकाश वो रक्षाबंधन आ रहा है जब से हमारी शादी हुई है तब से मैं मम्मी पापा से मिलने सिर्फ एक दिन के लिए ही गई हूं सोच रही हूं एक हफ्ते के लिए घर चली जाऊं घर की बहुत याद आ रही है और राखी भी तो है ना गोलू भी मेरा इंतजार कर रहा है कल ही उससे बात हुई थी कह रहा था दीदी कुछ दिन के लिए आ जाओ ना मेरा भी बहुत मन है अगर तुम कहो तो…

“ठीक है अपने मम्मी पापा से कह दो कि घर पर बात कर ले मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं है लेकिन हां आखिर फैससा तो मम्मी-पापा का ही होगा ना”
आकाश का जवाब सुनकर चहकते हुए कुसुम ने तुरंत ही अपने मम्मी के पास फोन मिलाया और बताया कि वह घर आना चाहती है उसके सास-ससुर से बात कर ले।

काफी मान-मनौवत के बाद आखिरकार उसके सास-ससुर ने उसे हफ्ते भर के लिए मायके भेज दिया। मायके पहुंचकर जिसने भी कुसुम को देखा अपनी आंखों पर विश्वास नहीं कर पा रहा था मुरझा जो गई थी कुसुम।
पर इन सबसे बेपरवाह खुश थी वो एक हफ्ते के लिए ही सही पर कम से कम अपने लिए तो जिएगी और किसी के लिए नहीं,
शादी के बाद पहली बार अपने मायके आई थी मां-पापा, भाई-बहन सब उसके मन का कर रहे थे उसके चेहरे की मुस्कुराहट के लिए वह कुछ भी करने को तैयार थे, हो भी क्यों ना राजकुमारी थी वो अपने घर की। वैसे भी कहा जाता है ससुराल में लड़की बेशक रानी ना बन पाए पर अपने मायके में राजकुमारी तो होती ही है।

उधर कुसुम के ससुराल में छह महीने के बाद सबको आटे-दाल का भाव मालूम हो रहा था जहां नौ बजे नाश्ते के लिए सबको लेट हो जाता था वहां बारह बजे चाय नसीब हो रही थी, सब एक दूसरे पर चिल्ला रहे थे एक दूसरे को कोस रहे थे जैसे कोई टाइम ही नहीं था पूरा घर बेतरतीब हो चुका था।

आकाश जब फोन करता तो उसे घर के हालातों के बारे में बताता तो चुपचाप सुन लेती पर मन ही मन खुश होती चलो अब तो मेरी कोई कद्र होगी उस घर में।

किसी तरह तीन दिन बीते होंगे उसकी सासू मां का फोन आया “हैलो कुसुम मायके में ऐश से मन भर गया हो तो अब यहां भी आ जाओ और आना हो तो बताओ वरना मैं नौकरानी रख लूं” इतना कहकर उन्होंने फोन रख दिया
कुछ देर के लिए कुसुम वही जड्वत खड़ी रही उसे अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था सासू मां ने उसे यह भी नहीं पूछा तुम कैसी हो? सासु मां की आखिरी शब्द रह-रह कर उसके मन को छलनी कर रहे थे
“आना हो तो बताओ वरना मैं नौकरानी रख लू”
मतलब मुझ में और नौकरानी में कोई फर्क नहीं है मैंने सबका दिल जीतने के लिए कितनी कोशिश है, भूल गई थी मैं अपने आप को और मुझे बेटी का प्यार तो छोड़ो बहू का सम्मान भी नसीब नहीं हुआ इन लोगों के लिए मैंने इतना सब कुछ किया सब बेकार है, इनके लिए बहू का सम्मान सिर्फ एक नौकरानी के समान है, जब कभी आकाश ने मेरी मदद के लिए मम्मी जी से नौकरानी की बात करनी चाही तो हमेशा उन्होंने टाल दिया कि काम ही कितना होता है घर में।
इसी उधेड़बुन में उलझी थी कुसुम उसकी मम्मी ने आवाज लगाई, “बेटा यह ऊन का लच्छा सुलझा दे, बहुत उलझ गया है मुझसे नहीं हो पा रहा है।”
“हां मां अभी आई मैं भी बहुत उलझी हुई हूं पहले खुद को सुलझा लू एक आत्मविश्वास से भरी मुस्कान के साथ उसने अपनी सासू मां को फोन लगाया

“हैलो मम्मी जी आपने जवाब मांगा था ना मेरा तो सुनिए, आपकी बातों से लगता है कि इस समय आपको बहू कि नहीं एक नौकरानी की जरूरत है तो आप नौकरानी रख लीजिए जब आपको आपकी बहू की जरूरत होगी बता दीजिएगा मैं जरूर आ जाउंगी नमस्ते”
बिना अपनी सास के जवाब का इंतजार किए बिना उसने फोन रख दिया और अपनी उलझन सुलझाने के बाद वो मुस्कुराते हुए उनका लच्छा सुलझाने चली गई।

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दोस्तों हमारे समाज की आज भी यह बहुत बडी विडंबना है कि बहू के कर्तव्य तो उन्हें गिना दिए जाते हैं पर अधिकार नहीं दिए जाते। एक लड़की जो अपना घर-बार छोड़कर एक नये घर में खुद को स्थापित करने की कोशिश करती है उसकी मदद करने के बजाए घर का सारा काम उन पर छोड़कर ऐसे बेफिक्र हो जाते हैं जैसे उन्हें कोई बंधुआ मजदूर मिल गया है। ऐसे में कोई लड़की कैसे किसी घर को अपना मान सकती है कैसे अपना सकती है?

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नीरजा तिवारी

By नीरजा तिवारी

शब्दों के सागर से मोती चुन,उन्हें भावनाओं में पीरोती हूँ...

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