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“बधाई हो आपके घर लक्ष्मी आई है” नर्स ने बाहर आकर खुशखबरी दी तो अशोक की आंखें भर आई। शादी के दस साल बाद आखिर वो और सुमन मां-पापा बने थे।

“सिस्टर सुमन कैसी है” सहमते हुए अशोक ने पूछा।

” ठीक है मां और बच्चा दोनों स्वस्थ हैं थोड़ी देर में वार्ड में शिफ्ट कर देंगे उसके बाद आप मिल सकते हैं” सिस्टर अशोक को बता ही रही थी कि दूसरी सिस्टर उसकी बेटी को उसके पास ले आई।

“देख लीजिए बेबी को” कहते हुए उसने उस मासूम को अशोक की बाहों में दे दिया। कपकपाते हाथों से अशोक ने उसे लिया और उसकी आंखों से आंसू की धारा अनवरत बहने लगी।

“मानसी मेरी बिटिया मानसी” अशोक के मुंह से निकला आखिर इतने सालों में एक पल भी बच्चे की चाहत उनके मानस-पटल से हटी नहीं थी। आज उनकी वर्षों की तपस्या का फल मिला था।

हॉस्पिटल की सारी औपचारिकताएं पूरी होने के बाद आज मानसी अपने घर आई थी। अपनी गोद में नन्हीं सी जान लिए सुमन ने गृह प्रवेश किया। उसको आज बाँझ का ताना देने वाले लोगों का मुंह बंद हो गया था, लेकिन कहने वाले कहने से नहीं चूकते।

“इतने सालों बाद ईश्वर ने कोई औलाद भी दी तो लड़की, सोचा था पोते का मुंह दिखाएगी लेकिन यहां तो…”

“मां चुप भी हो जाओगी, अभी अभी अस्पताल से आई है सुकून की सांस तो लेने दो और क्या पोता पोता लगा रखा है पहले कहती थी कोई औलाद हो जाए, अब जब हो गई है तो पोता चाहिए तुम्हें” अशोक ने अपनी मां को चुप कराते हुए कहा।
लेकिन सुमन की आंखें छलछला गई थी। यह सोच कर कि क्या स्वागत हुआ है मेरी बिटिया का। आखिर क्या गलती है इसकी? यही कि बिटिया है।

तो कुछ इस तरह मानसी के जीवन के पहले पड़ाव की शुरुआत हुई, कुछ लोग खुश थे तो कुछ नहीं। अपने मां पापा की लाडली मनु, प्यार से दोनों उसे मनु बुलाते थे। उसकी किलकारियों से घर गूंजता रहता। कितने भी कड़वे घूंट पीने पड़े सुमन को लेकिन मानसी की परवरिश में कोई कमी ना आने देती। आखिर मां है अपनी नन्ही सी जान पर कैसे कोई आंच आने देती।

अशोक भी उसकी सारी ख्वाहिशें पूरी करता। दो साल की हो चली थी मानसी अब। अपनी तोतली भाषा में जब बोलती।
“पापा चौक्की लाए?” अशोक गोद में उठाकर उसकी झोली चॉकलेट से भर देता। पायल पहने छम-छम करती घर में सबको दिखाती, खुश होती। दिनभर उसकी धमाचौकड़ी चालू रहती। एक पल के लिए भी शांत ना बैठती। उसकी दादी कई बार सुमन को कहती,

“लड़की है यह थोड़ा धीरज सिखाया कर पांच बरस की हुई ना है दिनभर उधम मचाती है, बस में ना रहेगी आगे चलकर”

“जी मांजी” कहकर सुमन चुप हो जाती पर मन ही मन सोचती, यही तो मैं चाहती हूं बस में ना रहे ये किसी की। अपने जीवन की उन्मुक्त उड़ान खुलकर उड़ सके। जी सके यह अपनी जिंदगी। खुला आसमान दूंगी मैं अपनी लाडली को।

वक्त के साथ मानसी अब बड़ी हो रही थी काफी कुछ समझती थी वह। घर में वह अपनी मां को चक्की की तरह पिसते हुए देखती थी। और मन ही मन खुद से वादा करती कि आने वाले सालों में वो इतनी काबिल बनेगी की मां को ढेर सारी खुशियां देगी। खेलकूद और पढ़ाई में अव्वल मनु से घर की परिस्थितियां ज्यादा दिनों तक छिपाई नहीं जा सकती थी। देखते ही देखते मनु बारह की हो चुकी थी खेलते-कूदते, हंसते-गाते मनु अपनी जिंदगी का पहला पड़ाव पार कर चुकी थी।

नीरजा तिवारी

By नीरजा तिवारी

शब्दों के सागर से मोती चुन,उन्हें भावनाओं में पीरोती हूँ...

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