लालू यादव के बिना क्यों सुनी है बिहार की राजनीति

बेबाक इंडिया, दिल्ली, अंशु रंजन: ‘हाथी पड़े पांकी में, सियार मारे हुचुकी’ । जब हाथी कीचड़ में फंसा रहेगा तो सियार हंसी उड़ायेंगे ही लेकिन हाथी के कद पर उसका कोई अंतर नहीं पड़ता। संकट आयेगा और खत्म हो जायेगा।
उनके इसी अंदाज पर लाखों की भीड़ जुटा करती थी कभी, और बिहार की राजनीति में नए नए अंदाज देखने को मिलते थे। इस लोकसभा चुनाव में बिहार की सियासत और जनता दोनो को लालू यादव (Laalu Yadav) के गवई अंदज की कमी खल रही है और सुना है राजनीति का आंगन

चुनावी फिजांओं में इस बार ‘खैरा- पीपल कभी न डोले’ जैसी खांटी भोजपुरी की लोकोक्तियां नहीं गूंजेंगी।

बहरहाल, लालू के जेल में रहने के चलते इस बार बिहार के चुनाव प्रचार में लालू का अपना गंवई अंदाज़ देखने को नहीं मिलेगा। वैसे तो चारा घोटाले में 2013 में सजा मिलने के बाद ही लालू के चुनाव लड़ने पर रोक लग गई थी लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव और 2015 की विधानसभा चुनाव के दौरान लालू को अपनी पार्टी के उम्मीदवार के पक्ष में रैली करने का मौका मिला था।

लालू यादव जब अपने भाषणों में महंगाई पर वार करना होता तो भोजपुरिया समाज में उनकी लोकोक्ति ही हथियार बन जाती थी। उनका कहना था कि जब चीजें महंगी होती हैं तो व्यापारी कहते हैं ‘देशावर टनले बा’ लेकिन माल ज्यादा होने के बाद चीजें सस्ती हो जायें तो तुरंत जवाब मिलेगा ‘देशावर ठेलले बा’

लालू प्रसाद यादव के जेल में होने का असर बिहार में उनकी पार्टी की राजनीति पर काफ़ी दिखा भी है। मसलन, महागठबंधन की सीटों और उम्मीदवारों को तय करने में काफ़ी वक़्त लगा। इसके बाद लालू प्रसाद यादव (Laalu Prasad Yadav)के बड़े बेटे तेज प्रताप भी बग़ावती तेवर के साथ मैदान में उतर आए हैं। इन सबसे आरजेडी की स्थिति कमज़ोर होने का अनुमान लगाया जा रहा है, ये भी कहा जा रहा है कि अगर लालू बाहर होते तो ये सब नौबत नहीं आती। जिस तरह से लालू के बडे बेटे तेज प्रताप ने पार्टी और घर दोनों जगह तांड़व मचाया है शायद लालू यादव होते ऐसा नहीं होता ।

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बहरहाल, लालू प्रसाद यादव की ग़ैर-मौजूदगी ने लालू यादव (Laalu Yadav)के छोटे बेटे तेजस्वी को बिहार की सियासत में पांव टिकाने में मदद की है। उन्होंने जिस तरह से महागठबंधन के सीट बंटवारे में पिछड़ों और दलितों का ध्यान रखा है, इसे विश्लेषक उनकी राजनीतिक परिपक्वता के रूप में देख रहे हैं।

बिहार की सियासत में लालू प्रसाद यादव (Laalu Prasad Yadav) के समर्थक और विरोधी दोनों की राय, लालू को लेकर नहीं बदली है । उनके समर्थक जहां उन्हें सामाजिक राजनीति का मसीहा बताते हैं, वहीं उनके विरोधी उन्हें भ्रष्टाचार और वंशवाद के हिमायती नेता बताने से गुरेज नहीं करते है । लालू यादव के जेल में होने से उनके विरोधियों की मानो चांदी निकल आई है ।

याद कीजिए बिहार का 2015 विधान सभा चुनाव, जिसमें नरेंद्र मोदी बिहार विधानसभा चुनाव में अपनी तमाम लोकप्रियता और संसाधनों के बावजूद नरेंद्र मोदी लालू प्रसाद यादव से पार नहीं पा सके थे । इस चुनाव में बीजेपी और मोदी दोनों को मुह की खानी पड़ी थी । इस चुनाव के दौरान एक चुनावी सभा में लालू ने मोदी की नकल उतारकर अपने समर्थकों को खूब हंसाया था।

मसलन, लालू यादव ने अपनी एक रैली में तो यहां तक कह दिया था, “मोदी जी, इस अंदाज़ में मत बोलिए वरना गर्दन की नस खींच जाएगी.” बिहार को पैकेज देने के नाम पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की घोषणा की नकल भी लालू ने बखूबी उतार कर दिखाया था।

बहरहाल, जाब लालू जब अपने राजनीतिक करियर में उफान पर थे तो हमेशा कहा करते थे जब तक रहेगा समोसे में आलू तब तक बिहार में रहेगा लालू. इस बार लालू ख़ुद तो नहीं हैं लेकिन उनकी बातें और उनकी विरासत की लड़ाई को आगे बढ़ाने का दारोमदार तेजस्वी यादव पर है ।
लालू यादव (Laalu Yadav) की एक कहावत उन पर सही बैठती है ‘ताड़ काटो तरकुल काटो, काटो रे बनखजा, हाथी पर के घुघुरा चमक चले राजा’ के माध्यम से वे विराधियों को चेताते रहे कि बच्चों का खेल खेलना बंद करें। राजा हमेशा हाथी पर चलता रहेगा और सबसे ऊंचा रहेगा

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