अपने पापा और उनके भाइयों के बीच अकेली मैं, घर में सबकी लाडली| दादा-दादी, चाचा-चाची और आठ भाइयों की अकेली बड़ी बहन, हर रिश्ते से भरी थी मेरी झोली। जहां बड़ों की लाडली थी वहीं अपने छोटे भाइयों पर खूब दादागिरी दिखाती।

इन सबके बीच भी एक रिश्ते से खाली थी मैं। एक बहन की चाहत थी, बचपन से चाहती थी 'काश एक बहन होती' जिसके साथ लड़ती झगड़ती और जब वह मेरे कपड़े पहनती तो मैं चीखती-चिल्लाती। पर बहुत प्यार करती मैं अपनी बहन से। बहन का रिश्ता अपनी मम्मी और मौसी के बीच देखा था मैंने बहुत ही खूबसूरत रिश्ता होता है इसी रिश्ते को बहुत मिस करती थी मैं।

मेरे अपने दो छोटे भाई हैं लेकिन जब भी मुझे पता चलता कि मेरी चाची प्रेग्नेंट है। उसी दिन से हर रोज ईश्वर से प्रार्थना करती, "हे ईश्वर अब कि मुझे बहन दे देना" लेकिन हर बार ऐसा लगता जैसे ईश्वर ने अपने कानों में रुई डाल रखी है, मेरी सुनता ही नहीं था एक-एक करके पहली चाची को दो बेटे, दूसरी को एक, तीसरी को एक और चौथी को भी दो बेटे हुए।

बेटे के जन्म से जहां सब खुश होते पर मैं मायूस हो जाती। मुझे तो बहन चाहिए थी ना। इसी बीच मेरी एक चाची का  आठवे महीने में मिसकैरिज हुआ। जानते हैं वह एक लड़की थी, मेरी बहन। घर में सब बहुत रोए थे मैं भी। एक मुराद थी वह, उस ईश्वर ने जिसे गोद में आने से पहले ही हमसे छीन लिया था।

पर कहते हैं ना 'ईश्वर के घर देर है अंधेर नहीं'  मेरी वही चाची एक साल बाद फिर मां बनी और इस बार मेरी मुराद पूरी हुई। मैं खुशी से झूम उठी, नन्ही सी एक परी ने जन्म लिया था। मैंने उसका नाम 'खुशी' रखा। उस दिन मेरे घर में फिर सब बहुत रोये थे, पर यह खुशी के आंसू थे। मेरे होने के बाद पहली बार तेईस साल बाद हमारे घर में एक लड़की ने जन्म लिया था।

पूरे हॉस्पिटल में मिठाइयां बांटी गई। हमारी खुशी देखकर बगल वाली पेशेंट की आंखों में आंसू आ गए थे क्योंकि उसने भी एक बेटी को जन्म दिया था, और उसकी सास और पति उसे अकेला छोड़ कर चले गए थे, उसके शब्द आज भी कानों में गूंजते हैं,"काश मेरी बेटी की किस्मत में भी आप जैसा परिवार होता"। खैर इस बारे में फिर कभी बात करेंगे।

पर, हम बहुत खुश थे। मेरी बचपन की मुराद पूरी हुई थी, मुझे बहन मिली थी। जो तेईस साल छोटी थी मुझसे। उसे अपनी गोद में लेकर मुझे बहन से ज्यादा मां जैसा फील होता। मेरा पूरा दिन उसके साथ ही गुजरता उसकी प्यारी-प्यारी बातें, मेरे साथ खेलना, सब मुझे बहुत भाता।

उसे बिल्कुल मेरी तरह बनना है मेरे जैसे बाल चाहिए, मेरी जैसी ड्रेस चाहिए, यहां तक कि मेरे रूम जैसा मिरर भी चाहिए मैडम को। मेरे सारे कॉस्मेटिक्स इस्तेमाल करती। कई बार खीझ जाती मैं, पर फिर सोचती इसीलिए तो बहन चाहिए थी मुझे।

उसे मेरे रूम के मिरर से बहुत प्यार है, जब मेरी शादी होने वाली थी, तो अक्सर कहती," दीदी जब तुम चली जाओगी तब यह मिरर मेरा हो जाएगा ना", मैं झल्ला जाती फिर हंस पड़ती और कहती है," मैडम... सब तुम ही ले लेना मेरा"

आज मेरी शादी को दो साल हो चुके हैं। मेरे मायके से किसी का फोन आए ना आए पर वह रोज दिन में चार बार फोन करती है "दीदी... मुझे तुम्हारी याद आ रही है..."

डिस्क्लेमर:- इस पोस्ट में व्यक्त किए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत राय हैं। ज़रूरी नहीं कि वे विचार या राय bebaakindia.com के विचारों को प्रतिबिंबित करते हों। कोई भी चूक या त्रुटियां लेखका की हैं और bebaakindia.com की उसके लिए कोई दायित्व या ज़िम्मेदारी नहीं है।

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अपने पापा और उनके भाइयों के बीच अकेली मैं, घर में सबकी लाडली| दादा-दादी, चाचा-चाची और आठ भाइयों की अकेली बड़ी बहन, हर रिश्ते से भरी थी मेरी झोली। जहां बड़ों की लाडली थी वहीं अपने छोटे भाइयों पर खूब दादागिरी दिखाती।

इन सबके बीच भी एक रिश्ते से खाली थी मैं। एक बहन की चाहत थी, बचपन से चाहती थी ‘काश एक बहन होती’ जिसके साथ लड़ती झगड़ती और जब वह मेरे कपड़े पहनती तो मैं चीखती-चिल्लाती। पर बहुत प्यार करती मैं अपनी बहन से। बहन का रिश्ता अपनी मम्मी और मौसी के बीच देखा था मैंने बहुत ही खूबसूरत रिश्ता होता है इसी रिश्ते को बहुत मिस करती थी मैं।

मेरे अपने दो छोटे भाई हैं लेकिन जब भी मुझे पता चलता कि मेरी चाची प्रेग्नेंट है। उसी दिन से हर रोज ईश्वर से प्रार्थना करती, “हे ईश्वर अब कि मुझे बहन दे देना” लेकिन हर बार ऐसा लगता जैसे ईश्वर ने अपने कानों में रुई डाल रखी है, मेरी सुनता ही नहीं था एक-एक करके पहली चाची को दो बेटे, दूसरी को एक, तीसरी को एक और चौथी को भी दो बेटे हुए।

बेटे के जन्म से जहां सब खुश होते पर मैं मायूस हो जाती। मुझे तो बहन चाहिए थी ना। इसी बीच मेरी एक चाची का  आठवे महीने में मिसकैरिज हुआ। जानते हैं वह एक लड़की थी, मेरी बहन। घर में सब बहुत रोए थे मैं भी। एक मुराद थी वह, उस ईश्वर ने जिसे गोद में आने से पहले ही हमसे छीन लिया था।

पर कहते हैं ना ‘ईश्वर के घर देर है अंधेर नहीं’  मेरी वही चाची एक साल बाद फिर मां बनी और इस बार मेरी मुराद पूरी हुई। मैं खुशी से झूम उठी, नन्ही सी एक परी ने जन्म लिया था। मैंने उसका नाम ‘खुशी’ रखा। उस दिन मेरे घर में फिर सब बहुत रोये थे, पर यह खुशी के आंसू थे। मेरे होने के बाद पहली बार तेईस साल बाद हमारे घर में एक लड़की ने जन्म लिया था।

पूरे हॉस्पिटल में मिठाइयां बांटी गई। हमारी खुशी देखकर बगल वाली पेशेंट की आंखों में आंसू आ गए थे क्योंकि उसने भी एक बेटी को जन्म दिया था, और उसकी सास और पति उसे अकेला छोड़ कर चले गए थे, उसके शब्द आज भी कानों में गूंजते हैं,”काश मेरी बेटी की किस्मत में भी आप जैसा परिवार होता”। खैर इस बारे में फिर कभी बात करेंगे।

पर, हम बहुत खुश थे। मेरी बचपन की मुराद पूरी हुई थी, मुझे बहन मिली थी। जो तेईस साल छोटी थी मुझसे। उसे अपनी गोद में लेकर मुझे बहन से ज्यादा मां जैसा फील होता। मेरा पूरा दिन उसके साथ ही गुजरता उसकी प्यारी-प्यारी बातें, मेरे साथ खेलना, सब मुझे बहुत भाता।

उसे बिल्कुल मेरी तरह बनना है मेरे जैसे बाल चाहिए, मेरी जैसी ड्रेस चाहिए, यहां तक कि मेरे रूम जैसा मिरर भी चाहिए मैडम को। मेरे सारे कॉस्मेटिक्स इस्तेमाल करती। कई बार खीझ जाती मैं, पर फिर सोचती इसीलिए तो बहन चाहिए थी मुझे।

उसे मेरे रूम के मिरर से बहुत प्यार है, जब मेरी शादी होने वाली थी, तो अक्सर कहती,” दीदी जब तुम चली जाओगी तब यह मिरर मेरा हो जाएगा ना”, मैं झल्ला जाती फिर हंस पड़ती और कहती है,” मैडम… सब तुम ही ले लेना मेरा”

आज मेरी शादी को दो साल हो चुके हैं। मेरे मायके से किसी का फोन आए ना आए पर वह रोज दिन में चार बार फोन करती है “दीदी… मुझे तुम्हारी याद आ रही है…”

डिस्क्लेमर:- इस पोस्ट में व्यक्त किए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत राय हैं। ज़रूरी नहीं कि वे विचार या राय bebaakindia.com के विचारों को प्रतिबिंबित करते हों। कोई भी चूक या त्रुटियां लेखका की हैं और bebaakindia.com की उसके लिए कोई दायित्व या ज़िम्मेदारी नहीं है।

नीरजा तिवारी

By नीरजा तिवारी

शब्दों के सागर से मोती चुन,उन्हें भावनाओं में पीरोती हूँ...

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