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शादी के बाद मेघा पहली बार मायके आई है, बहुत खुश है| आज वो पूरे तीन महीने बाद आज अपने घर आई है। उसकी शादी के बाद जैसे पूरा घर उदास हो गया था, पर आज पूरा घर चहक रहा है। मेघा के पहली बार मायके आने पर खूब आवभगत हो रही है| मेघा के मां-पापा और दोनों भाई सब अपनी-अपनी तरह से उसे खुश करने में लगे हैं। मम्मी ने तरह-तरह के पकवान बनाए हैं, पापा गंगाराम के यहां के उसकी फेवरेट बेसन के लड्डू लाए हैं| उसके भाई जो हर काम करने से मना कर देते थे, आज उसकी एक आवाज पर दौड़ लगा रहे हैं।
“दी कुछ और चाहिए क्या”?
“नहीं, कुछ नहीं चाहिए| वैसे तुम दोनों को क्या हो गया है, सारी बात मान रहे हो? क्या बात है!” उसने चुटकी लेते हुए अपने दोनों भाइयों से कहा।
“अरे दीदी, अब मेहमान हो ना| कुछ दिन के लिए आई हो, सोचा खुश कर दें तुम्हें” भाइयों ने भी उसे छेड़ते हुए कहा।
“अच्छा बच्चू… मेहमान नहीं हूं मैं। घर है मेरा, है ना मां।”
“हां बेटा घर है तेरा और हमेशा रहेगा।”
“समझे तुम दोनों घर है मेरा” मां के सीने से लगते हुए पूरे अधिकार के साथ मेघा ने कहा।
“अच्छा बेटा  यह सब छोड़ ये बता तेरे ससुराल  ठीक-ठाक तो है कोई दिक्कत कोई परेशानी तो नहीं है?”

“हाँ मां सब ठीक है, मम्मी-पापा, दीदी सब बहुत अच्छे हैं”
“और दामाद जी….?”
“अरे मनस वह तो बहुत ही अच्छे हैं मां, मेरा बहुत ख्याल रखते हैं पता है जब हम हनीमून गए थे तो हमने सब के लिए गिफ्ट्स लिये मम्मी-पापा, दीदी और तो और मनस ने आप सबके लिए भी गिफ्ट्स लिए हैं।”
“हमारे लिए…? हमारे लिए क्या जरूरत थी बेटा? पता नहीं दामाद जी क्या सोच रहे होंगे?”
“अरे मम्मी क्या सोचेंगे उन्होंने खुद लिए हैं। मोनू जाओ मेरा बैग लेकर आओ दिखाती हूं।”
“यह लो… मेरे लिए क्या भेजा है जीजू ने?” मेघा को बैग थमाते हुए मोनू ने पूछा।”
“दिखाती हूं ना” कहते हुए मेघा ने सबके गिफ्ट्स निकाल कर सब को देने लगी।
“तुम दोनों के लिए टी-शर्ट और जींस है, पापा आपके लिए घड़ी है और मेरी प्यारी-प्यारी मां के लिए यह खूबसूरत साड़ी।”
“बेटा साड़ी तो सच में बहुत सुंदर है।”
“हां मां आपके बड़े बेटे और बेटी की पसंद है ना”
“पर बेटा मैं इसको कैसे ले सकती हूं?”
“क्यों मां क्यों नहीं ले सकती इतने प्यार से हम दोनों ने आपके लिए खरीदी है पसंद नहीं आई क्या आपको?”
“ऐसी कोई बात नहीं है तुम्हारा कन्यादान किया है ना पांव पूजा है तुम्हारा। अब तुम्हारे यहां का पानी पीना भी पाप है हमारे लिए।”
“पर मां यह तो गिफ्ट है ना” मेघा ने उदास होकर कहा।
“पर बेटा है तो तुम्हारे पैसों का”
“तो क्या हुआ मेरी शादी हो गई है, क्या तुम्हारे लिए अपने भाइयों के लिए मैं कुछ नहीं ले सकती? क्या सच में जो लोग कहते हैं शादी के बाद लड़की पराई हो जाती हैं क्या सच में पराई हो गई हूं मैं?”

“नहीं बेटा ऐसी कोई बात नहीं है हमारी संस्कृति में कन्यादान के बाद कन्या के घर का पानी भी नहीं पीते, तो मैं यह सब कैसे ले सकती हूं?”
“पर मां….”
“अच्छा सुन ले लेते हैं लेकिन तुम पैसे ले लेना हमसे जितने का भी है” मेघा के पापा ने  उसको बीच में रोकते हुए कहा।
“क्या पापा आप भी मां का साइड ले रहे हो। आपने मुझमें और इन दोनों में कभी कोई फर्क नहीं किया बल्कि हमेशा मुझे ही आगे रखा। शादी से पहले घर की सारी शॉपिंग मैं ही करती थी। आप सबके लिए जो पसंद था ले लेती थी। वही तो आज भी किया है ना और पापा वैसे भी शादी से पहले ही मैंने मनस को साफ कर दिया था कि जो आदर सम्मान वह अपने परिवार के लिए मुझसे चाहते हैं वहीं उन्हें मेरे परिवार को भी देना होगा और मनस दे  भी रहे हैं। जैसे वह वहां मम्मी पापा की फिक्र करते हैं वैसे ही आप दोनों की भी करते हैं इन दोनों को भी अपना छोटा भाई ही समझते हैं। तभी तो मेरे बिना कहे उन्होंने दोनों परिवार के लिए गिफ्ट्स लिए हैं। और आप दोनों ने भी तो खुद उनसे कहा था कि आप लोगों के लिए वह बड़े बेटे हैं तो जब एक बेटे की तरह आप लोगों के लिए कुछ कर रहे हैं या करना चाहते हैं तो मना क्यों कर रहे हैं आप? क्या कहूं उनसे मैं तुम दामाद हो तुम्हारे पैसों का कुछ नहीं लेंगे।
पापा बेटी हूं मैं इस घर की। प्यार करती हूं आप लोगों से। अच्छा लगता है जब आप लोगों के लिए कुछ करती हूं। प्लीज पापा बेटी ही रहने दीजिए मुझे। यूं पराया ना बनाइए कि चाह कर भी मैं कुछ ना कर पाऊं आप सबके लिए।” मेघा के इस तर्क ने सभी को निरूत्तर कर दिया।

“अच्छा बेटा तू जीती मैं हारा वैसे भी बातों में कभी कोई जीत ही नहीं सकता तुझसे” पापा ने कहा।
“पर बेटी है वह….”
“हां बेटी है और हमेशा बेटी ही रहेगी| तभी तो कह रहा हूं ले लो बहुत प्यार से लाई है” पापा ने उसकी मां को बीच में रोकते हुए कहा।
“थैंक यू पापा, अब मैं बहुत खुश हूं” कहते हुए मेघा अपने पापा के सीने से लग गई।
दोस्तों, अक्सर यह देखा जाता है कि शादी के बाद जब लड़की अपने परिवार के लिए अपने पैसों से कुछ लेती है तो वह उसे लेने से हिचकिचाते हैं कि कन्या का धन हम नहीं ले सकते। एक बेटी जीवनभर अपने मां पापा की फिक्र करती है उनके लिए कुछ करना चाहती है। आज के समय में जब लड़का लड़की बराबर हैं का नारा बुलंद हो रहा है जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में लड़कियां अपना नाम रौशन कर रहीं हैं, ऐसे में ये विचारधारा कितनी सही है?
इस पर आपके क्या विचार हैं कमेंट बॉक्स में जरूर बताइएगा।

डिस्क्लेमर:- इस पोस्ट में व्यक्त किए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत राय हैं। ज़रूरी नहीं कि वे विचार या राय bebaakindia.com के विचारों को प्रतिबिंबित करते हों। कोई भी चूक या त्रुटियां लेखका की हैं और bebaakindia.com की उसके लिए कोई दायित्व या ज़िम्मेदारी नहीं है।

नीरजा तिवारी

By नीरजा तिवारी

शब्दों के सागर से मोती चुन,उन्हें भावनाओं में पीरोती हूँ...

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