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बेबसी लाचारी और जिंदगी

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सड़क पर लेटी वेदना से कहारती एक गर्भवती स्त्री बगल में 5 साल का उसका बेटा उसे दिलासा देता है मां गाड़ी आएगा गाड़ी आएगा…

गर्भवती पत्नी और 2 साल की नन्ही सी मासूम बेटी को हाथ गाड़ी से खींचता हुआ एक मजबूर पति एक पिता…

30 किलोमीटर की लंबी यात्रा के बाद सड़क पर अपने बच्चे को जन्म देने को मजबूर मां…

आंखों में आंसू सर पर गठरी का बोझ उठाए भूखे पेट सड़क पर सैकड़ों मासूम…
कोई ट्रेन से कटकर मर रहा है किसी को बस ने कुचल दिया तो कोई छिपकर जिस ट्रक से आ रहा था उसके पलटने से मौत की आगोश में समा गया।।

ऐसी तस्वीरें प्रतिदिन दिल को छलनी कर रही है,  यह वह लोग हैं जिनके बिना देश नहीं चल सकता, कोई राज्य, कोई शहर नहीं चल सकता, जिनकी मेहनत के पसीने से शहरों की बड़ी बड़ी बिल्डिंग खड़ी होती है, सड़के बनती है, फैक्ट्रियों में अपने मालिकों की गालियां खाकर भी यह उन्हीं का काम करते हैं, जीवन की दिनचर्या के प्रत्येक वस्तु इन्हीं के खून पसीने से बनी होती है या यूं कहें कि यह कम पढ़ा-लिखा वर्ग जिसे आज के कुछ लोग अनपढ़ और बेवकूफ जैसे शब्दों से नवाजते हैं। किसी देश समाज का मूल आधार है तो मेरे विचार से गलत नहीं होगा।

कोरोनावायरस के चलते हुए इस लाॅकडाउन से समाज का हर वर्ग अपने-अपने स्तर पर परेशान है, उच्चवर्ग का लाभ खत्म हो गया है, मध्यम वर्ग की जमापूंजी खत्म हो गई है लेकिन जो सबसे ज्यादा विपदाओं से घिरा हुआ है वो यही वर्ग है जिसे मजदूर कहते हैं प्रतिदिन ऐसी दुखद तस्वीरें देखने के बाद यही दुआ निकलती है “ईश्वर इनकी मदद करें” क्योंकि सरकार,समाज या व्यक्तिगत स्तर पर यदि कोई मदद कर रहा है या तो इन तक नहीं पहुंच रही या नाकाफी है। इसलिए इनकी मदद की गुहार ईश्वर से ही लगाई जा सकती है।

इन दिनों समाचार चैनलों पर दिखाई जा रही डीबेट में हर पार्टी अपना गुणगान और विपक्षी पर निशाना साधने में जुटे हैं समझ ही नहीं आ रहा है यदि सब मदद ही कर रहे हैं तो यह क्यों ऐसी तस्वीरें सामने आ रही हैं,  कहां कर रहे हैं मदद, क्यों कोई सरकार चाहे वह राज्य की हो, चाहे वह राज्य जहां यह काम करते हैं, चाहे वह राज्य जहां के स्थाई निवासी हैं। क्यूँ ये विश्वास नहीं दिला पा रहे हैं कि हम उनके साथ हैं आखिर क्यों यह पलायन करने को मजबूर हैं, क्यों कभी किसी ट्रक, ट्रेन, बस के नीचे कुचले जा रहे हैं, क्यों भूख से मर रहे हैं।

नहीं जानती कि कौन सी पार्टी, कौन सी सरकार क्या कर रही है, कौन झूठ बोल रहा है कौन सच। इनकी मदद कितनी किसको मिल रही है या नहीं। बस इतना समझ आता है जो है कम है बहुत कम है। जब यह तस्वीरें देखने से जब हमारा दिल सहम जाता है, आंखे नम हो जाती हैं, वेदनाओं की लहरें उठने लगती है, तो उनकी तकलीफ का अंदाजा लगाना भी नामुमकिन है। भूखे प्यासे नंगे पैर अपने बच्चे को अपने कंधे पर उठाए किसी तरह अपनी जन्मभूमि तक पहुंच जाने के इनकी तड़प रूह कंपा देने वाली है। इन के दर्द को देखकर मौत भी सहम जाती है शायद इसीलिए इन्हें अपनी गोद में सुला लेती है। इस जिंदगी में गरीबी और लाचारी के साथ उम्र भर लड़ते हुए जिंदगी भी हार जाती है शायद मौत की गोद में थोड़ा सुकून हो। इनके दर्द इनकी बेबसी की झलक इन शब्दों में साफ दिखाई देती है…..

मजदूर हूं साहब मजबूर हूं
रोटी की तलाश में यहां आया था
आज जीने की उम्मीद लिए घर जा रहा हूं
तुम कहो तो बेवकूफ भी हूं
यहां भी मर रहा हूं रास्तों पर भी मर रहा हूं
कहीं भी रहूँ  मर मर के जी रहा हूं
यूं समझ लो साहब
जब मरना ही है तो अपनी मिट्टी अपने आंगन में मरने जा रहा हूं
तुम कहो तो बेवकूफ भी हूँ
मजदूर हूं साहब मजबूर हूँ ।।

डिस्क्लेमर:- इस पोस्ट में व्यक्त किए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत राय हैं। ज़रूरी नहीं कि वे विचार या राय bebaakindia.com के विचारों को प्रतिबिंबित करते हों। कोई भी चूक या त्रुटियां लेखका की हैं और bebaakindia.com की उसके लिए कोई दायित्व या ज़िम्मेदारी नहीं है।

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नीरजा तिवारी

शब्दों के सागर से मोती चुन,उन्हें भावनाओं में पीरोती हूँ...
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