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दोस्ती की दास्ताँ

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“हेलो मधु, सुमन बोल रही हूं”

“हां बोल क्या हुआ?”

” कुछ पूछूं तुझसे”

“हां बोल”

“यार मेरे पास कुछ रुपए है तुझे कोई जरूरत हो तो बता”

“नहीं यार मुझे कोई जरूरत नहीं है पर पूछ क्यों रही है?”

” कुछ नहीं बस यूहीं, बहुत दिन से एक फोन लेने की सोच रही हूं और सोचा अगर तुझे तेरी पढ़ाई में कोई जरूरत हो तो!”

“पागल, मुझे जरूरत नहीं है तू ले ले फोन, वैसे भी तेरा फोन बहुत पुराना हो गया है मेरे पास ही पैसे होते तो मैं तुझे दिला देती”

मधु और सुमन बेस्ट फ्रेंड है एकदम पक्की वाली। अपना कोई भी काम एक-दूसरे से पूछे बिना नहीं करती। एक ओर मधु अपनी पढ़ाई पूरी कर रही है वहीं सुमन कमा कर अपने घर की मदद कर रही है। आर्थिक दृष्टि से दोनों ही निम्न मध्यमवर्गीय परिवार से हैं जहां आवश्यकताएं तो पूरी हो जाती हैं लेकिन चाहतों के लिए कोई जगह नहीं होती।

मधु की जिंदगी में और भी बहुत से दोस्त हैं लेकिन सुमन के लिए वो ही सब कुछ है। मधु की खुशी के लिए वो  कुछ भी करने को तैयार है। मधु भी जानती है  जैसे  तारों के बीच चंद्रमा रहता है  वैसे ही उसके सभी दोस्तों में सुमन है  उसकी जान।

“सुमन सुमन तुझे कुछ बताना है” सुमन से मिलने आई मधु ने उसे गले लगाते हुए कहा”

“अरे क्या हुआ बड़ी खुश लग रही है”

“हां यार पता है तुझे मेरा एंट्रेंस एग्जाम क्लियर हो गया है”

“वाह बहुत खुश हूं आज मैं, यार ये तो बहुत ही अच्छी गुड न्यूज़ है”

और दोनों सहेलियां खुशी से झूम उठी। लेकिन यह खुशी ज्यादा दिनों तक नहीं टिक पाई, क्योंकि काफी कोशिशों के बाद भी मधु के परिवार वाले एडमिशन की फीस का इंतजाम नहीं कर पाए थे।

दोनों मायूस थी मधु की आंखें नम थी, तभी सुमन ने उसका हाथ अपने हाथों में लिया और कहा,

“मधु आज तक कभी अफसोस नहीं हुआ आज हो रहा है काश! मेरे पास इतने पैसे होते कि मैं तुझे यह कोर्स करवा सकती, पता नहीं ईश्वर ने हमारे साथ ऐसा क्यों किया है?”
इतना कहकर सुमन की आंखों से टप टप आंसू निकल पड़े।

कुछ देर मधु सुमन को यूं ही देखती रही। उसकी यह बात और सुमन की मासूमियत उसकी दिल की गहराइयों को छू गई थी। सुमन को चुप कराते हुए उसने कहा,

“सुमन एक कोर्स ही तो है अगर इसमें मेरा एडमिशन नहीं होगा तो मेरी जिंदगी तो नहीं खत्म हो जाएगी ना? तू इतना उदास मत हो और रही बात ईश्वर की तो उसने ऐसा क्यों किया, शायद उन्होंने मेरे लिए इससे बेहतर कुछ सोच रखा हो और मुझे उनसे कोई शिकायत नहीं है, उन्होंने मेरी जिंदगी का सबसे खूबसूरत तोहफा दिया है मुझे, तुझे, तेरी सच्ची दोस्ती, तेरी मासूमियत यार दुनिया में हर किसी को नसीब नहीं होते इतने अच्छे दोस्त। देख मेरे आंसू तेरी आंखों से बहते हैं हर कोई इतना खुश-नसीब नहीं होता मेरी दोस्त। और अगर तेरा साथ रहा तो मैं अपनी लाइफ में जरूर कुछ ना कुछ बेहतर कर लूंगी, इसमें कोई शक है तुझे?”

“नहीं कोई शक नहीं है मेरी मास्टरनी कोई शक नहीं है पर तूने बहुत मेहनत की थी ना, तेरे लिए बहुत इंपॉर्टेंट था”

“हां मेहनत भी की थी और इंपॉर्टेंट भी था पर तेरे आंसुओं के आगे कुछ भी इंपॉर्टेंट नहीं है, अच्छा चल अब इस टाॅपिक को यहीं खत्म करते हैं और मेरे लिए एक अच्छी सी मैगी बना दे, तुझे पता है ना तेरे हाथ कि मैगी मुझे बहुत पसंद है”

“हां… हां… पता है भुक्कड़ चल”

और दोनों सहेलियां फिर अपनी जिंदगी में आगे बढ़ चली अपनी दोस्ती को नये रंगो से भरने।
डिस्क्लेमर:- इस पोस्ट में व्यक्त किए गए विचार लेखिका ‘नीरजा तिवारी’ के व्यक्तिगत राय हैं। ज़रूरी नहीं कि वे विचार या राय bebaakindia.com के विचारों को प्रतिबिंबित करते हों। कोई भी चूक या त्रुटियां लेखिका की हैं और bebaakindia.com की उसके लिए कोई दायित्व या ज़िम्मेदारी नहीं है।

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