The Emergency 1975 : आज से 44 साल पहले देश में आपातकाल घोषित कर दिया गया था, पढिए फिर क्या हुआ

साल 25 जून 1975 Emergency, रायसीना हिल्स, क्या पता था आजादी के महज 28 साल बाद जब इसी रायसीना हिल्स से इंदिरा गांधी का काफिला गुजरेगा तो हिंदुस्तान की तरीख में एक काला दिन दस्तक दे देगा जिसके बाद हिंदुस्तान हीं पूरी दुनिया की नजर हिंदुस्तान की पहचान के साथ जुड़ जाएगी उसका नाम और कुछ नही इमरजेंसी (The Emergency 1975) शब्द होगा और सबसे लोकतंत्र के जमहूरियत का गला घोट दिया जाएगा, 28 साल पहले जिनके पिता ने भारत को लोकतंत्र से मिलन कराया था उन्ही की बेटी अपनी राजनीतिक लालसा को पूरा करने के लिए लोकतंत्र में एक काला अध्याय जोड़ देगी जो हमेशा के लिए भारत जैसे बडे देश के लोकतंत्र पर काला सिहाई छोड़ जाएगा।
रात्रि के 9 बजे गाडियों का एक काफिला जाता है राष्ट्रपति भवन और लिखी जाती है भारत के लोकतंत्र पर काली सिहाई से एक काला अध्याय जिसे हम सब इमरजेंसी (The Emergency 1975) के रुप में याद करते है। 25 जून 1975 की आधी रात को आपातकाल की घोषणा की गई, जो 21 मार्च 1977 तक लगी रही। उस दौरान तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली सरकार की सिफारिश पर भारतीय संविधान की धारा 352 के अधीन देश में आपातकाल की घोषणा की थी।
बहरहाल, 25 जून की  रात्रि के 9 बजे गाडियों का एक काफिला राष्ट्रपति भवन जाता है। उस काफिले में थी उस समय की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी। कहा जाता है कि आपातकाल (The Emergency 1975) की नींव 12 जून 1975 को ही रख दी गई थी. इस दिन इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को रायबरेली के चुनाव अभियान में सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग करने का दोषी पाया था और उनके चुनाव को खारिज कर दिया था. इतना ही नहीं, इंदिरा पर छह साल तक चुनाव लड़ने पर और किसी भी तरह के पद संभालने पर रोक भी लगा दी गई थी ।
12 जून 1975 को इंदिरा गांधी को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने दोषी पाया और छह साल के लिए पद से बेदखल कर दिया। इंदिरा गांधी पर वोटरों को घूस देना, सरकारी मशनरी का गलत इस्तेमाल, सरकारी संसाधनों का गलत इस्तेमाल जैसे 14 आरोप लगे थे। राज नारायण ने 1971 में रायबरेली में इंदिरा गांधी के हाथों हारने के बाद मामला दाखिल कराया था। जस्टिस जगमोहनलाल सिन्हा ने यह फैसला सुनाया था।
24 जून 1975 को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश बरकरार रखा, लेकिन इंदिरा को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बने रहने की इजाजत दी।
25 जून 1975 को जयप्रकाश नारायण ने इंदिरा के इस्तीफा देने तक देश भर में रोज प्रदर्शन करने का आह्वाहन किया ।
“सदियों की ठंढी, बुझी राख सुगबुगा उठी, मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है; दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो, सिंहासन खाली करो कि जनता आती है” 25 जून 1975 की शाम को दिल्ली के रामलीला मैदान में राष्ट्रकवि रामधारी सिंग दिनकर की ये कविता जयप्रकाश नारायण के लिए एक ऐसा नारा बन गया जो इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंक दिया। उस दिन दिल्ली के रामलीला मैदान में जेपी की ऐतिहासिक सभा हुई। उस सभा में दिनकर की कविता की लाइनें सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।
जेपी की जुबान से क्या निकला इस नारे की गूंज में इंदिरा गांधी को अपना सिंहासन डोलता नज़र आया। शाम से रात हुई और उसी रात को इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लगाने का फैसला कर लिया। आनन फानन में आपातकाल (The Emergency 1975) के मसौदे को अंतिम रूप दिया गया और आधी रात को ही राष्ट्रपति से दस्तखत करवाया गया। यानी आपातकाल तो रात में ही लग गया लेकिन देश को इसकी खबर अगले दिन इंदिरा गांधी के रेडियो संदेश से लगी।
इमरजेंसी लगने से पहले इंदिरा गांधी और ख़ासतौर पर संजय गांधी की मंडली ने दो बातों की तैयारी कर ली थी। पहली, किन नेताओं की गिरफ़्तारी करनी है। इस कड़ी में इमरजेंसी के दौरान क़रीब 13 हज़ार छोटे-बड़े नेताओं को गिरफ्तार किया गया। इसके अलावा कुल 1 लाख लोग जेल में डाले गए। इमरजेंसी लगते जो दूसरी बात हुई, वो थी इंदिरा सरकार के ख़िलाफ़ लिखने वाले प्रेस पर कैसे शिकंजा कसना है। कहा जाता है कि इमरजेंसी लगने के दौर में इंदिरा राज में ये संजय गांधी का पहला शक्ति प्रदर्शन था।
देश में अंग्रेजी हुकूमत के दौरान भी प्रेस पर इतने क्रूर सेंसरशिप का शिकंजा नहीं कसा गया था जितना कि आपातकाल के दौरान पाबंदी लगी। उन दिनों दिल्ली के बहादुर शाह ज़फ़र मार्ग पर ज़्यादातर अख़बारों के दफ़्तर थे। प्रेस को सबक सिखाने के लिए 25 जून की आधी रात को बहादुर शाह ज़फ़र मार्ग इलाक़े की बिजली काट दी गई। 26 जून की सुबह ज़्यादातर घरों में अख़बार नहीं पहुंचे। ये हुआ था संजय गांधी और उनकी मंडली के इशारों पर जिसमें हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री बंसीलाल, गृह राज्य मंत्री ओम मेहता, दिल्ली के तत्कालीन गवर्नर किशन चंद और इंदिरा गांधी के निजी सचिव आर के धवन शामिल थे।
 इमरजेंसी लगाने के पीछे की सबसे बड़ी वजह इंदिरा गांधी की सत्ता में बने रहने की लालसा को बताया जाता है। दरअसल इमरजेंसी (Emergency) की नींव की सबसे मजबूत ईंट इलाहाबाद हाईकोर्ट का वो मुकदमा बना जो इंदिरा गांधी पर 1971 में हुए लोकसभा के चुनाव में धांधली का आरोप लगाते हुए राजनारायण ने दाखिल किया था।
1971 के चुनाव में राजनारायण उत्तर प्रदेश की रायबरेली सीट से इंदिरा गांधी के खिलाफ चुनाव में हार गए थे। चुनाव के चार साल बाद राजनारायण ने अदालत में इंदिरा की जीत को चुनौती दी थी। 12 जून, 1975 को इलाहाबाद हाइकोर्ट के जज जगमोहन लाल सिन्हा ने ना सिर्फ रायबरेली के उस चुनाव को खारिज कर दिया बल्कि इंदिरा गांधी को दोषी मानते हुए उन पर 6 साल तक चुनाव ना लड़ने की पाबंदी लगा दी।
जेपी का भाषण इमरजेंसी का आधार बना लेकिन इसकी पटकथा इंदिरा और सिद्धार्थशंकर राय के दिमाग़ में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले के बाद से तैयार थी। सिद्धार्थ शंकर राय ने इमरजेंसी (The Emergency 1975) लगाने का सुझाव दिया, जिस पर पहले इंदिरा तैयार नहीं थीं लेकिन जेपी की सभा के बाद इंदिरा के घर संजय गांधी, गृह राज्य मंत्री ओम मेहता, हरियाणा के मुख्यमंत्री बंसीलाल की मौजूदगी में सिद्धार्थ शंकर रे ने इमरजेंसी का मसौदा तैयार किया ।

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