दिल्ली विश्वविद्यालय में सोशल वर्क, परिछेत्र और चुनोतियां’ विषय पर हुआ राष्ट्रीय सम्मेलन

न्यूज़ डेस्क, बेबाक इंडिया || दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेज में ‘भारतीय सोशल वर्क: परिछेत्र और चुनोतियाँ’ विषय पर दो दिवसीय सेमीनार के पहला दिन का कार्यक्रम सफलतापूर्वक आयोजन किया गया|  दो दिवसीय संगोष्ठी का उद्घाटन 14 मार्च, बुधवार को दिल्ली विश्वविद्यालय के डॉ. भीमराव अंबेडकर कॉलेज, में भारतीय शिक्षण मंडल के राष्ट्रीय संगठन मंत्री मुकुल कानिटकर ने किया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथियों में मुकुल कानिटकर (नेशनल ओर्गानिज़िंग सेकेट्री, भारतीय शिक्षण मंडल) , प्रोफेसर इन्दर मोहन कपाही (मेम्बर, यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशनबी), प्रोफेसर मनोज कुमार (प्रमुख, डिपार्टमेंट ऑफ़ सोशल वर्क, महात्मा गाँधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा), डॉक्टर जी. के. अरोड़ा प्राचार्य, डॉक्टर भीम राव अम्बेडकर महाविद्यालय सहीत देश के विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया |

कार्यक्रम के मुख्य बिंदु पर प्रकाश डालते हुए भारतीय शिक्षा मंडल के नेशनल ओर्गानिज़िंग सेकेट्री मुकुल कानिटकर ने कहा की “मौजूदा भारतीय समाज कार्य की अवधारणा रोजगार के संबध में एक पेशा नही है बल्कि समाज के रूप के लिए सेवा है| यह  जिवन के कल्यान और उनके समाजिक बदलाव का उदेश्यपूर्वक वैज्ञानिक चर्चा है |’’ साथ ही उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया की आज पश्चिमी विश्व की तरह, भारतीय सामाजिक सुरक्षा उपायों के सार्वजनिक वित्तीय निर्भर सरकार के लिए एक वित्तीय बोझ सा बन गया है। उदाहरण के लिए दुनिया के सबसे ताकतवर देश संयुक्त राज्य अमेरिका (अमेरिका) भी सामाजिक सुरक्षा पर बढ़ते खर्च के कारण आर्थिक चुनौतियों का लगातार सामना कर रहा है। भारत में परिवार प्रणाली मूल संस्था है जो सामाजिक सुरक्षा के कई पहलुओं की देखभाल करती है जिसके लिए पश्चिमी विचारकों या उनके भारतीय समकक्ष सरकारी मशीनरी और सार्वजनिक धन की ओर देखते हैं।

कार्यक्रम में संस्कृतिक नृत्य व संगीत का भी आयोजन किया गया जिनमें छात्रओं ने भाग लिया।

सोशल वर्क: परीछेत्र और चुनोतियाँ’  में आये प्रोफेसर इन्दर मोहन कफी ने भी कहा की नेहरु के समय में बौधिक निर्वात उस समय के समाज कार्य के पाश्चात्य मॉडल के पक्षकारो द्वारा अधिकृत था जो आज तक चला आ रहा है अब इसे बदलने की ज़रूरत है| कपाही ने कार्यक्रम की प्रसंशा करते हुए कहा की समाज कार्य के भारतीयकरण के लिए इस तरह के और कदम उठाने की आवश्यकता है| इस प्रकार के पहल की आवश्यकताओं पर प्रकाश डालते हुए अबेंडकर कॉलेज के प्राचार्य डॉक्टर जी.के. अरोड़ा ने कहा की भारत के पास एक समाजिक कार्य के शानदार संस्कृति है लेकिन दुर्भाग्यवश ये सांस्कृतिक ज्ञान इस तरह के शैक्षिक व्यवस्था से प्राप्त नही किया जा सकता|

गौरतलब है कि अंबेडकर महाविद्यालय में दो दिवसीय इस सेमिनार को इंडियन काउंसिल ऑफ़ सोशल साइंस रिसर्च (ICSSR), महात्मा गाँधी अंतराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा और देश के अन्य समाज कार्य से संबधित प्रतिनिधियों का सहयोग मिला है|

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