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“नेहा तुम्हारे सर पर पल्लू क्यों नहीं है”?
नेहा की सासू मां ने किचन में काम कर रही नेहा से कहा तो उसने हड़बड़ा कर सर पर पल्लू रखते हुए कहा,
“गलती से गिर गया था मम्मी जी”
“जरा ध्यान रखा करो इन बातों का बहू हो तुम इस घर की।”
“जी मम्मी जी” नेहा ने सहमति में सर हिला दिया।
नेहा की शादी को अभी दो महीना ही हुआ है। नेहा अपने ससुराल में एक आदर्श बहू बनने की पूरी कोशिश कर रही है। घर में सास-ससुर, पति और एक ननद है। परिवार छोटा है लेकिन शायद ही ऐसा कोई दिन जाता हो जब घर में तीन से चार मेहमान ना आते हो।
पूरे घर में एक वरुण ही है (उसका पति) जिससे वो अपने मन की बात कह सकती हैं। वह भी अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहा है कि नेहा घर में जल्दी से जल्दी अर्जेस्ट हो जाए। लेकिन बात-बात पर उस घर में नेहा को ये एहसास कराया जाता है कि वह घर की बहू है उसे क्या करना चाहिए क्या नहीं करना चाहिए।
जैसे जून की तपती गर्मी में उसे भारी साड़ी पहननी है क्योंकि वह घर की नई बहू है। यहां तक कि किचन में भी सर से पल्लू नहीं हटना चाहिए क्योंकि वह बहू है। अपनों से बड़ों के सामने बराबर नहीं पर बैठना है क्योंकि वह घर की बहू है।

वह लड़की जो कभी कुर्ती के साथ दुपट्टा भी नहीं लेती थी जिसके पास वैस्टर्न कपड़ों का एक खूबसूरत कलेक्शन था। आज सुबह से शाम तक सर का पल्लू संभालती है। रात को सारा काम निपटा कर जब नेहा नाइटी पहनती तो ऐसा महसूस करती जैसे जंजीरों से आजाद पंछी एक बार फिर अपने पंख फैला रहा है।
वरुण नेहा को गौर से देखता है फिर अपने ख्यालों में खो जाता है क्या इसीलिए शादी की थी मैंने नेहा से? पिछले दो सालों से मैं जिस अल्हड़, बेपरवाह, मस्तमौला नेहा को जानता था वह तो कहीं गुम सी हो गई है कितनी शांत हो गई है मेरी नेहा।
“वरूण क्या हुआ, क्या सोच रहे हो” नेहा ने वरुण को झकझोरते हुए कहा।
“कुछ नहीं, तुम्हें क्या हुआ है तबीयत तो ठीक है ना। बहुत बुझी-बुझी सी लग रही हो।
“हां तबीयत तो ठीक है पर मुझे घर की बहुत याद आ रही है। मैं अपने घर जाना चाहती हूं तुम बात करो ना मम्मी पापा से। मेरा बहुत मन कर रहा है। मां कि बहुत याद आती है।” कहते हुए नेहा रूंआसी हो गई।
“अरे क्या हुआ मेरी जान को किसी ने कुछ कहा क्या?” वरुण ने नेहा को अपनी बांहों में भरते हुए पूछा तो वो उसके सीने से लिपट फूट-फूट कर रोने लगी।
“किसी ने कुछ नहीं कहा बस मुझे घर जाना है, अपने घर।”
“पर नेहा अब तो यही तुम्हारा घर है ना! यह घर और यह परिवार तुम्हारा ही तो है।”
कुछ देर तक नेहा शांत रही फिर उसने कहा-
“नहीं वरुण यह मेरा घर नहीं है। जिस घर में मैं अपनी पसंद के कपड़े नहीं पहन सकती, अपनी मर्जी से कुछ कर नहीं सकती, हर काम करने से पहले मुझे सोचना पड़ता है कि किसी को बुरा ना लग जाए, हर वक्त मन में एक डर रहता है कहीं कोई गलती ना हो जाए, उस घर को कैसे कहूं कि मेरा घर है। मेरे घर में तो इतना बंधन नहीं था ना वरुण। सच कहूं तो दम घुटता है मेरा यहां। ऐसा लगता है जैसे मेरा मुझ पर ही कोई अधिकार नहीं है। यह मत पहनो यह पहनो, ऐसे नहीं ऐसे बैठो, यहां नहीं वहां बैठो, किसी के सामने ज्यादा मत बोलना, जरूरत हो तो ही बोलना वरना सर हिला कर जवाब देना। कभी कभी तो ऐसा लगता है जैसे मैं कोई कठपुतली हूं जिसकी डोर किसी और के हाथों में है। मैं , मैं रही ही नहीं वरूण, कोई और बनती जा रही हूं। तुम तो जानते हो ना मुझे। तुम ही बताओ क्या ऐसे ही थी मैं? क्या मेरे इसी रूप को तुमने पसंद किया था?”

वरुण निरुत्तर था सच कह रही थी नेहा। जिस घर में इतने बंधन हो उसे कोई कैसे अपना सकता है। वरुण ने मन ही मन एक फैसला किया।
अगले दिन जब नेहा उठी तो उसने देखा बेड पर एक खूबसूरत गुलाबी रंग का सूट रखा है। वरूण उसे देख कर मुस्कुरा रहा है, यह वही सूट था जिसे शादी से पहले वरुण ने उसके लिए उसके जन्मदिन पर दिलवाया था, जो आज तक उसकी अलमारी में सबसे नीचे बड़े जतन से रखा हुआ था।
“मेरी जान आज तुम यहीं पहनोगी”
“पर वरुण मम्मी जी….?”
“कुछ नहीं सुनना मुझे मम्मी जो भी बोलेंगी मैं देख लूंगा, जिस तरह धीरे-धीरे अपने प्यार से मैंने तुम्हें अपना बनाया है वैसे ही अब मेरी जिम्मेदारी है कि मैं इस घर को तुम्हारा घर बनाऊंगा। जिसकी शुरुआत है ये।”
“वरूण तुम कितने अच्छे हो, आई लव यू” कहते हुए उसके सीने से लग गई नेहा।
“मैडम जाओ जल्दी से नहा कर आओ तब तक मैं घर का माहौल देखता हूं क्योंकि कपड़ों का मैटर तो मैं संभाल लूंगा लेकिन नहाने में लेट मत करना”
“हां जाती हूं” कहते हुए एक नई उम्मीद लिये बाथरूम में घुस गई नेहा।

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दोस्तों, अक्सर ऐसा देखा जाता है कि जब कोई लड़की शादी करके ससुराल जाती है तो वहां उसे कंट्रोल करने की पूरी कोशिश की जाती है और साथ ही यह नसीहत देते रहते हैं कि अब यह घर उसका है। ऐसे में ये प्रश्न खडा होना लाजिमी है कि कोई लड़की किसी घर को कैसे अपना सकती है।
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