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बहु का घर ( भाग-2)

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वरूण ड्राइंग रूम में पहुंचा तो देखता है कि मां (रेखा जी) और पिता जी (मुकुंद जी) चाय की चुस्कियां लेते हुए न्यूज़ देख रहे हैं।

“अरे वाह… क्या बात है मां आज चाय आपने बनाई, मजा आ गया आज तो”

“हां बेटा बनाई है महारानी तो सात बजे से पहले आएंगी नहीं और तेरे पापा को चाय पीने का मन था तो सोचा मैं ही बना दूं” रेखा जी ने चाय का कप वरूण को देते हुए कहा।

“वाह मजा आ गया मां अच्छा हुआ जो नेहा जल्दी नहीं आई, आज कितने दिनों बाद तुम्हारे हाथ की चाय पी रहा हूं।” चाय की चुस्की लेते हुए वरूण ने अपनी मां से कहा।

“बिल्कुल सही कह रहे हो बेटा मैं भी तरस गया था तुम्हारी मां के हाथ की चाय पीने के लिए जब से बहू आई है ये तो रसोई का रास्ता ही भूल गई थी” मुकुंद जी ने वरुण का साथ देते हुए कहा तो दोनों के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

“वैसे मां चाहे जो भी हो एक बात तो बिल्कुल सही कही आपने यह नेहा भी ना लेट कर देती है हजार बार उससे कहा है कि भारी भरकम साड़ी पहने में इतनी देर करती हो सूट ही पहन लिया करो। जानती हो आज तो जबरदस्ती मैंने उसे बोला कि सूट पहनकर जल्दी बाहर आओ” खुशनुमा माहौल का फायदा उठाते हुए वरुण ने अपनी बात रखी तो इतना सुनते ही रेखा जी और मुकुंद जी दोनों सकते में आ गए।

“यह क्या कह रहा है सूट पहनेगी अब वह आज तक हमारे घर में किसी बहू ने सूट नहीं पहना है तू सूट पहनाएगा।
साडी में क्या परेशानी है।”

“मां परेशानी की बात नहीं है साडी में कंफर्टेबल फील नहीं करती वो। कपड़ों की तो बात है मां, रहने दो ना। उस दिन जब निधि (वरुण की बुआ की बेटी) यहां आई थी तो उसने बताया था कि उसके ससुराल में वह सब कुछ पहनती है जैसे चाहे वैसे रहती है तो आप कितना खुश हुई थी। आपने तो यहां तक कहा था कि तनु(वरूण की बहन) के लिए भी आप ऐसा ही ससुराल चाहती हैं। तो मां नेहा के साथ भेदभाव क्यों। वैसे भी सूट ही तो पहनना है। आखिर वो भी तो किसी की बेटी है ना मां”

“इतना बड़ा हो गया है तू, अब मुझे समझाएगा?”

“समझा नहीं रहा हूं मां, जो आपने सिखाया है वही कर रहा हूं आपने ही तो सिखाया है ना औरतों की रिस्पेक्ट करनी चाहिए उनकी इच्छाओं का सम्मान करना चाहिए वही तो कर रहा हूं।”

रेखा जी कोई जवाब देती तब तक नेहा ने आकर उनके पैर छुए। गुलाबी सूट पहने माथे पर सिंपल सी लाल बिंदी, हाथों में मैचिंग की प्लेन चूड़ियां, पैरों में सिंपल सी खूबसूरत पायल पहने गजब की सुंदर लग रही थी नेहा। रेखा जी एकटक नेहा को देख रही थी आज पहली बार उन्हें लग रहा था कि सादगी कितनी खूबसूरत होती है।

“अरे भाग्यवान बहु पैर छू रही है” मुकुंद जी ने उनसे कहा तो “खुश रहो” सिर्फ इतना ही कह पाई वो और उठकर वहां से चली गई। जिससे नेहा का चेहरा उतर गया।

“अरे बहु बुरा मत मानना ऊपर से थोड़ा सक्त है पर दिल की बहुत नरम है। थोड़ा वक्त दो समझ जाएगी।” मुकुंद जी ने नेहा से कहा तो मुस्कुरा कर रह गई।

उधर वरुण से उसकी आंखें चार हुई तो उसने आंखों ही आंखों में वरुण को धन्यवाद किया वरूण ने भी उसी अंदाज में नेहा की तारीफ की। इतने में तनु भी उठ आई उसने नेहा को देखा तो खुशी से उछल पड़ी।

“वाह भाभी कितनी खूबसूरत लग रही हो आप। अब तक साड़ी में लिपटी सकुचाई सी देखा है आपको। साडी के साथ-साथ आप तो सूट में भी कितनी सुंदर लग रही हो”

“अच्छा जी तारिफ छोडो अब चलो फ्रेश हो जाओ तबतक मैं नाश्ता तैयार करती हूँ।”

नेहा खुश थी आज लेकिन एक कमी भी थी। मां ने बात तक नहीं की आज उससे। वो अपने विचारों में खोई हुई नाश्ते की तैयारी कर रही थी कि वरूण उसके पीछे आकर खड़ा हो गया।

“अरे वरूण तुम”

ये भी पढें:-बहु का घर (पार्ट-1) पढने के लिए यहां क्लिक करें…

“क्या हुआ तुम्हें? अब क्या सोच रही हो। देखो मैंने कमाल कर दिया ना। मिल गई ना तुम्हें भारी-भरकम साड़ी से छुट्टी अब पहनो सूट पर एक बात बताऊं साड़ी में भी कमाल की लगती हो। अगर मन करे तो कभी-कभी पहन लेना अच्छा लगता है मुझे।”

“अच्छा अच्छा यह सब छोड़ो ना मां ने बात तक नहीं की मुझसे और उठ कर चली गई, अच्छा नहीं लगा ना उन्हें।”

“तो यह बात है देखो नेहा मां दिल की बुरी नहीं है अपनी जिंदगी में मां ने बहुत कुछ झेला है दादी हमेशा मां पर हुकुम चलाती थी।  वह कितने भी दुख में हो पापा ने कभी मां का साथ नहीं दिया। अब वह सास बनी है जो उन्हें  सही लगता है वह तुमसे कहती हैं करने को। पर वक्त बदल गया है मैं हर पल हर हाल में तुम्हारे साथ हूं और मेरा विश्वास करो एक दिन यह घर तो क्या मां भी तुम्हारी होंगी। थोड़ा तुम कोशिश करो थोड़ा मैं करूंगा। एक काम करो नाश्ता लेकर मां के कमरे में जाओ। कुछ कहें तो कुछ मत कहना देखते हैं क्या होता है।”

“तुम ठीक कह रहे हो जैसे यह परिवार मेरे लिए नया है वैसे ही मैं भी इनके लिए नयी हूँ। थोड़ा वक्त तो लगेगा ही।”

“बिलकुल और हम दोनों साथ हैं तो सब मुमकिन है”

“ठीक है नाश्ता तैयार हो जाए तो लेकर जाती हूं”

इधर रेखा जी अपने अतीत के ख्यालों में गुम थी। कैसे उनकी सास उनके हर काम में नुक्स निकालती थी, कभी भी सीधे मुंह बात तक नहीं की थी उनसे। तरस गई थी  अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीने के लिए। क्या कुछ नहीं किया था उन्होंने उनके लिए लेकिन उन्होंने कभी भी एक शब्द उनकी तारीफ में नहीं कहा था। क्या जाने अनजाने में मैं भी ऐसे ही बनती जा रही हूं।

तभी नेहा ने आवाज दी “मां आपका नाश्ता”

“रख दो” रेखा जी ने एकटूक जवाब दिया।

ये भी पढें:-बहु का घर (अंतिम पार्ट) पढने के लिए यहां क्लिक करें…

नाश्ता रख कर नेहा कुछ देर वहीं खड़ी रही फ़िर हिम्मत जुटाकर बोली “मां आपको बुरा लगा कि मैंने सूट पहना, वो वरूण…”

“कोई बात नहीं अगर तुम्हें सूट पसंद है तो पहन सकती है मुझे क्या परेशानी होगी” रेखा जी ने नेहा को बीच में ही रोकते हुए कहा।

“थैंक यू मां” नेहा के दिल ने कहा की कसकर मां के गले लग जाए लेकिन उसने खुद को रोक लिया और सिर्फ मुस्कुरा कर रह गई। मन ही मन खुश थी कि कम से कम मां गुस्सा तो नहीं है।

नई शुरुआत की थी। भाग-3 में हम देखेंगे कि कैसे दोनों मिलकर इस बदलाव को आगे बढ़ाते हैं। आपको कहानी कैसी लगी अपनी प्रतिक्रिया जरुर दीजिएगा मुझे इन्तजार रहेगा।

डिस्क्लेमर:- इस पोस्ट में व्यक्त किए गए विचार लेखिका ‘नीरजा तिवारी’ के व्यक्तिगत राय हैं। ज़रूरी नहीं कि वे विचार या राय bebaakindia.com के विचारों को प्रतिबिंबित करते हों। कोई भी चूक या त्रुटियां लेखिका की हैं और bebaakindia.com की उसके लिए कोई दायित्व या ज़िम्मेदारी नहीं है।

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