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खौफ का साया…

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“भाभी मनु कहां है?”
बरखा के पड़ोसी के सोलह साल के बेटे रोहित ने पूछा।

“ड्राइंग रूम में है खेल रही है।”

“भाभी थोडी देर के लिए घर ले कर जा रहा हूँ थोड़ी देर बाद ले आऊंगा”

“ठीक है, पर ध्यान रखना”

“ठीक है भाभी” कहकर रोहित बरखा की तीन साल की बच्ची मनु को लेकर चला गया।

और बरखा अपने घर के कामों को निपटाने में लग गई। थोड़ी देर बाद उसके कानों में आवाज पड़ी-

तीन साल की मासूम के साथ दरिंदगी,
रिश्तेदार ने रौंद डाला मासूम की अस्मिता,
जिंदगी और मौत के बीच जूझ रही है मासूम,
नन्ही सी जान के साथ यह कैसी हैवानियत,

टीवी पर लगातार यह न्यूज़ फ्लैश हो रही थी इस खबर को सुनकर बरखा जैसे अपने होश में ही नहीं थी। कुछ देर के लिए शुन्य सी वहीं खड़ी रही। उसके सामने बार-बार अपनी मासूम मनु का चेहरा सामने आ रहा था और फिर बदहवास सी वो रोहित के घर की तरफ भागी।

“मनु मनु, चाची चाची मनु कहाँ है”

“क्या हुआ बरखा”

“कुछ नहीं चाची पहले यह बताइए मनु कहां है?”

“रोहित मनु और कृष को लेकर पार्क गया है” बरखा को परेशान देखकर रोहित की मम्मी ने बरखा से कहा।

बदहवास सी बरखा पार्क की तरफ दौड़ पड़ी-
“मनु मनु कहां हो बेटा मनु” वह चिल्ला रही थी

“भाभी मनु इधर खेल रही है” बरखा को इतना घबराया हुआ देखकर रोहित ने कहा।

मनु को देखते ही बरखा ने उसे अपने सीने से लगा लिया, पागलों की तरह उसके पूरे बदन को देख रही थी टटोल रही थी।

“भाभी क्या हुआ?”

“कुछ नहीं, बस यूं ही”

रोहित के पूछने पर बरखा ने उसे कह तो दिया कि कुछ नहीं लेकिन उसके मन में बवंडर चल रहा था। रोहित की अनदेखा कर वो मनु को गोद में लेकर अपने घर जाने लगी रास्ते में उसे हर शख्स हैवान नजर आ रहा था जो किसी की भी अस्मत को तार-तार करते हो। ऐसा लग रहा था जैसे कोई साया उसका पीछा कर रहा हो। जिससे वह अपनी और अपनी नन्ही सी जान को बचाने का प्रयास कर रही हो।

बचपन में अपने साथ हुए उस हादसे को बरखा आज तक नहीं भुला पाई थी। जब दूर के चाचा घर आए थे तीन दिन रूके थे वह। उन तीन दिनों में ना जाने कितनी बार उन्होंने उसे छुआ था। तकलीफ होती थी उसे, पर कुछ समझ ही नहीं पाई थी उस वक्त। जब तक समझ आया बहुत देर हो चुकी थी। वह कुछ नहीं कर पाई उसका।

आज जब भी उसे वह वाकया याद आता है मन कुंठा से भर जाता है, तड़प उठती है वह। अपनी नन्हीं सी जान को सीने से लगाए खुद से वादा करती है- “मेरी बच्ची जो कुछ मैंने सहा है कि तू कभी नहीं सहेगी। मां हूँ मैं तेरी, वादा है मेरा इन भेड़ियों से तुझे हमेशा बचा कर रखूंगी, ऐसी परवरिश दूंगी तुझे जो मैं अपनी मां से कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाई थी तू बेझिझक मुझसे कह सके। इतना काबिल बनाउंगी तुझे कि तू ऐसी किसी भी परिस्थिति का दृढता से सामना करने में सक्षम हो। “

दोस्तों, आज के समय में हर बेटी की मां इसी खौफ के साए में जी रही है। समाज की भेड़िए उसे हर जगह नोच खाने को तैयार है सच कहूं तो आज तो बेटे भी सुरक्षित नहीं है इन भेड़ियों से। आज विश्वास नाम का शब्द कहीं खो सा गया है। इस विषय पर आपके क्या विचार हैं अपने सुझाव भी जरूर बताइएगा जिससे हम खुद के साथ साथ अपनी लाडली को भी इन भेड़ियों से बचा सके।

डिस्क्लेमर:- इस पोस्ट में व्यक्त किए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत राय हैं। ज़रूरी नहीं कि वे विचार या राय bebaakindia.com के विचारों को प्रतिबिंबित करते हों। कोई भी चूक या त्रुटियां लेखका की हैं और bebaakindia.com की उसके लिए कोई दायित्व या ज़िम्मेदारी नहीं है।

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नीरजा तिवारी

शब्दों के सागर से मोती चुन,उन्हें भावनाओं में पीरोती हूँ...
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