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आ अब लौट चलें

आ अब लौट चलें

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” पापा जूते बाहर उतार दीजिए फिर हाथ-पैर धोकर ही अंदर आइएगा” ईशा ने अपने ससुर जी से कहा।

“हां हां बेटा पता है हाथ-पैर धोकर ही नहीं नहा कर ही अंदर आऊंगा, जब से ही कोरोना आया है तब से और जान की आफत हो गई है”
रमेश जी बडबडाते हुए बाथरूम में घुस गए।

“लाओ मुन्ने को मुझे दे दो तुम मेरे लिए एक कप चाय बना दो प्लीज” ईशा के पति रोहित ने कहा।

“रोहित आप अभी-अभी अखबार पढ़ रहे थे ना पहले साबुन से अच्छे से हाथ धो लीजिए फिर मुन्ने को लीजिएगा, पता नहीं कहां-कहां से किस-किस के हाथों से गुजर कर आता है ये” ईशा ने मुन्ने को गोद में उठाते हुए कहा।

“बेटा मैं बाहर से लाई हुई सब्जियां धो देती हूं तब तक तुम किचन में दाल चढ़ा दो” सब्जियों को हाथ में उठाते हुए ईशा की सासु मां ने कहा।

घर में अब यही माहौल रहता है हर कोई हर किसी को बस साफ-सफाई की नसीहत देता रहता है।

ईशा की दादी सास यह सब सुनकर मुस्कुराती हैं और कहती थी “बहू जब मैं कहती थी चप्पल बाहर निकालो, हाथ जोड़कर नमस्ते करो, नहा धोकर किचन में जाया करो, सूरज ढलने के बाद मुन्ने को बाहर मत ले जाओ, किसी अजनबी को मुन्ने को मत दिया करो, रोज रात को हल्दी वाला दूध पिया करो, तो तुम्हीं लोग मेरा मुंह पकड़ लेते थे कहते थे दादी यह तो सब पुरानी बातें हैं,
क्यों बेटा??
अब पता चल रहा है ना हमारे बुजुर्गों ने यह नियम यूं ही नहीं बनाए थे सब के पीछे कुछ ना कुछ कारण था।

“हां दादी मां मान गई इस कोरोना ने हमें अपनी भारतीय संस्कृति जिसे हम भूल चुके थे फिर याद दिला दी और अब हम इसी संस्कृति को अपनाकर इसको भगा सकते हैं” ईशा ने मुस्कुराते हुए अपनी दादी सास से कहा।

“तो बेटा अभी देर कहां हुई है आ अब लौट चलें अपनी महान संस्कृति की तरफ जिससे यह कोरोना तो क्या बड़ी से बड़ी बीमारी भी हमारा कुछ नहीं बिगाड़ पाएगी।

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नीरजा तिवारी

शब्दों के सागर से मोती चुन,उन्हें भावनाओं में पीरोती हूँ...
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