प्राइवेसी का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं- सुप्रीम कोर्ट

प्राइवेसी का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं- सुप्रीम कोर्टप्राइवेसी के अधिकार मामले बहस के दौरान सुप्रीम कोर्ट में अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा है कि प्राइवेसी को मौलिक अधिकार का दर्जा प्राप्त नहीं है. केंद्र की तरफ से वेणुगोपाल ने कोर्ट में कहा है, ‘राइट टू लाइफ के तहत ही प्राइवेसी है जो आर्टिकल 21 के अंतर्गत आते हैं. लेकिन प्राइवेसी को मौलिक अधिकार का दर्जा प्राप्त नहीं है.’

राइट टू प्राइवेसी के मामले में वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल और अटॉर्नी जनरल केके वेनुगोपाल ने अपनी बातें रखी हैं. आपको बता दें कि यह बहस आधार के मामले पर है. इसके लिए एक याचिका दाखिल की गई थी, जिसमें कहा गया कि आधार से जोड़ी जाने वाली स्कीम प्राइवेसी के अधिकार का हनन करती हैं.केके वेणुगोपाल ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि राइट ऑफ लाइफ के कई पहलू हैं जिनमें खाना, रहना और रोजगार का अधिकार शामिल है, लेकिन ये सब मौलिक अधिकर के अंतर्गत नहीं आते हैं.पिछले बुधवार को गोपाल सुब्रामण्यम ने सुप्रीम कोर्ट को कहा था कि आजादी जो लोकतंत्र का मूल सिद्धांत है, यह बिना प्राइवेसी के नहीं चल सकता.पूर्व सोलिसिटर जनरल सोली सोराबजी भी प्राइवेसी के मामले को सपोर्ट करते हुए सुप्रीम में पेश हुए. उन्होंने कहा संविधान स्पष्ट रूप से इसका अधिकार नहीं देता फिर भी इसे इस तरह समझा जाना चाहिए जैसे फ्रीडम ऑफ प्रेस को समझा जाता है.

टेक्नोलॉजी राज्य को आक्रामक और व्यापक होने की अनुमति देता है. इसमें सशक्त और अशक्त करने की क्षमता है.1954 और 1962 में सुप्रीम कोर्ट ने 20 वीं सदी में उठने वाले मुद्दे पर विचार नहीं किया.आज घर में अंदर क्या हो रहा है यह जानने के लिए किसी के घर में प्रवेश करने की कोई जरूरत नहीं है. यह मीलों दूर बैठे ही का पता लगाया जा सकता है.

टेक्नोलॉजी के इस युग में, गोपनीयता का अधिकार पूर्ण नहीं हो सकता. कोर्ट को एक संतुलन बनाना होगा और राज्य और व्यक्तियों और गैर-राज्य दलों और व्यक्तियों के बीच संचार की रक्षा करने के लिए एक विधि होना चाहिए. गोपनीयता किसी के भौतिक अस्तित्व, विचार और अंतर-व्यक्तिगत संबंधों से संबंधित है.

जब राज्य डेटा एक्सेस करता है, तो इसे कानून द्वारा स्वीकृत किया जाना चाहिए और यह एक वैध उद्देश्य के लिए होना चाहिए. इस देश में डेटा संरक्षण कानून होना चाहिए.

जीवन के अधिकार एक पूर्व-मौजूदा अधिकार है, जैसा कि अनुच्छेद 21 – ‘जीवन या निजी स्वतंत्रता से वंचित’ के शब्दों से समझा जा सकता है. कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के माध्यम से जीवन के अधिकार के अभाव की अवधारणा को अनुच्छेद 21 में बनाया गया है.हमें यह निर्धारित करने के लिए 20 साल से अधिक समय लगा कि अनुच्छेद 21 के तहत बनी प्रक्रिया निष्पक्ष है, वो भी संयुक्त राज्य अमेरिका से मूल ‘उचित प्रक्रिया’ अवधारणा को आयात करने के बाद. व्यक्तिगत स्वतंत्रता की विभिन्न प्रजातियां हैं. वे सभी मौलिक अधिकार की स्थिति के लिए स्वतः ही हकदार नहीं हैं. उनमें से प्रत्येक को उस संदर्भ में जांचना होगा जिसका दावा किया जाता है.

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